अर्थशास्त्र

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए पृथक सिद्धान्त की आवश्यकता | Need of a Separate Theory of International Trade in Hindi

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए पृथक सिद्धान्त की आवश्यकता | Need of a Separate Theory of International Trade in Hindi

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए पृथक सिद्धान्त की आवश्यकता

(Need of a Separate Theory of International Trade)

अन्तर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय व्यापार की समानताओं एवं असमानताओं के अध्ययन के पश्चात् प्रश्न यह उठता है कि क्या अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक पृथक सिद्धांत की आवश्यकता है? इस संबंध में दो विचारधारायें विद्यमान हैं जो निम्न हैं-

  1. प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का मत-

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के मतानुसार राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में कई आधारों पर अन्तर किया जाता है। राष्ट्रीय व्यापार के नियमन एवं नियंत्रण संबंधी नीतियों एवं परिस्थितियों अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर लागू होने वाली नीतियों एवं परिस्थितियों से भिन्न होती हैं। ऐसी स्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार हेतु एक पृथक सिद्धान्त की आवश्यकता है। प्रो० किण्डलबर्गर के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को विभिन्न कारणों से एक पृथक विषय समझा जाता है। ये कारण है, परम्पराएँ, वास्तविक संसार में अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रश्नों द्वारा प्रस्तुत की गई आवश्यक और महत्त्वपूर्ण समस्याएं, इसके द्वारा अपनाए जाने वाले नियमों घरेलू व्यापार के नियमों से भिन्नता इत्यादि।” प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक अलग से सिद्धान्त होना निम्न कारणों से आवश्यक हैं-

(i) बाजारों में विजातीयता- विश्व के बाजारों में व्यक्तियों की भाषा, उनकी रुचियों और रीति-रिवाजों, माप, तौल आदि में भिन्नताएँ होने के कारण समरूपता नहीं होती। इसी से क्रेताओं का व्यवहार भिन्न होता है। जैसे-भारत के नागरिक दायें हाथ की ओर से चलाई जाने वाली कार पसन्द करते हैं जबकि अमरीका के निवासी बायें हाथ की ओर से चलाये जाने वाली कार ।

(ii) विभिन केन्द्रीय बैंक के प्रभाव क्षेत्र- प्रत्येक देश में वहाँ के चलन पर इसकी राष्ट्रीय सरकार (अथवा केन्द्रीय बैंक) का नियन्त्रण होता है। मुद्रामान के सुचारु रूप से संचालित होने के लिए यह आवश्यक है कि केन्द्रीय बैंक एक विशेष नीति अपनाये। किन्तु यह जरूरी नहीं है कि यह नीति एक ही समय पर सभी देशों में समान हो। परिणामतः अन्तराष्ट्रीय व्यवहार जो कि विभिन्न मुद्रा अधिकारियों (Different monetary authorities) के प्रभाव क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों के मध्य आर्थिक व्यवहारों की श्रेणी में आते हैं, आन्तरिक व्यापार की तुलना में एक विशिष्ट स्थिति (Special position) रखते हैं। उसी से उसका पृथक अध्ययन भी आवश्यक हो जाता है।

(iii) विभिन्न सुविधाओं की व्यवस्था- प्रायः एक देश के उत्पादकों को वहाँ की सरकार द्वारा कुछ समान सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, लेकिन विभिन्न देशों में उत्पादकों को मिली हुई सुविधायें समान नहीं होती हैं। इस भेद के कारण भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का पृथक से अध्ययन करना उपयोगी है।

(iv) सरकार का हस्तक्षेप- आधुनिक समय में राज्य आर्थिक क्षेत्र में अधिक हस्तक्षेप करने लगे हैं। फलतः आजकल ‘सामान्य कीमत सिद्धान्त’ (General Theory of Value) के नियमों को, बिना संशोधन किये, लागू करना सम्भव नहीं रहा है।

(v) बाजारों का विभाजन- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भौगोलिक एवं राजनैतिक घटक बाजारों के विभाजन को प्रभावित करते हैं तथा एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रसाधनों के आवागमन का नियमन करते हैं। फलतः कीमत सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में लागू नहीं रहते।

(vi) विदेशी व्यापार में परिवर्तन- हमारा विश्व ‘परिवर्तनशील अर्थव्यवस्थाओं वाला विश्व’ है। यदि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का पृथक अध्ययन करें, तो इससे परिवर्तनशील घटकों और प्रवृत्तियों को समझाना अधिक सुगम हो जायेगा। कारण, संरचनात्मक परिवर्तन (Structural change) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा सबसे पहले दिखाई दे जाते हैं।

(vii) अन्तर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र सम्बन्धी विशिष्ट समस्यायें- यदि हम इन समस्याओं का अध्ययन आन्तरिक प्रवृत्तियों के बजाय विश्व-विकास प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में करें, तो उन्हें अधिक सुगमता से हल कर सकते हैं। जैसे-अन्तर्राष्ट्रीय तरलता, अन्तर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र की एक विशिष्ट समस्या है। इसके अतिरिक्त अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की स्थापना आदि।

(viii) परिवहन की समस्या- दो देशों के मध्य व्यापार होने पर उनके बीच की दूरी यदि अधिक है तो परिवहन की समस्या उत्पन्न होती है।

(ix) भिन्न राष्ट्रीय नीतियाँ- दो देशों की सरकारों की भिन्न-भिन्न आर्थिक नीतियाँ होती हैं जो उस देश के आयात-निर्यात को प्रभावित करती हैं।

  1. प्रो० ओहलिन का मत-

प्रो० वर्टिल ओहलिन के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए पृथक सिद्धान्त की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनके अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, अन्तर्क्षेत्रीय व्यापार का ही केवल एक विशिष्ट अवस्था ही है।”

प्रो० ओहलिन के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय व्यापार में श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण, उत्पादन का स्थानान्तरण एवं अधिकतम लाभ तीन समानताएं देखने को मिलती हैं। इस प्रकार प्रो० ओहलिन के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए उन्हीं सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाना उपयुक्त होगा जिनका उपयोग आन्तरिक या राष्ट्रीय व्यापार में किया जाता है। प्रो० ओहलिन ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के पृथक सिद्धान्त के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये हैं।

(1) लागतों में अन्तर की समान भूमिका होती है- यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में ही नहीं बल्कि अन्तक्षेत्रीय या राष्ट्रीय व्यापार पर भी लागू होता है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार सभी प्रकार का व्यापार चाहे वह विभिन्न व्यक्तियों के बीच हो अथवा विभिन्न क्षेत्रों के बीच या विभिन्न देशों के बीच हो, लागतों में अन्तर, श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण के कारण उत्पन्न होता है। विशिष्टीकरण उत्पादन की तुलनात्मक सुविधाओं के कारण उत्पन्न होता है। प्रत्येक व्यक्ति या राष्ट्र या राज्य उन्हीं वस्तुओं के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त करने का प्रयास करता है, जिनके उत्पादन में तुलनात्मक सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इस सिद्धान्त के जन्मदाता रिकार्डो ने इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था, “दो व्यक्ति जूते टोपी दोनों ही वस्तुएँ बना सकते हैं। इनमें से एक दूसरे की अपेक्षा इन दोनों ही कार्यों में अधिक कुशल हैं परन्तु टोपियों को बनाने में वह अपने प्रतिस्पर्धी की अपेक्षा 20% से अधिक कुशल हैं, जबकि जूते बनाने में वह उससे 33-1/3% अधिक कुशलता रखता है। ऐसी स्थिति में क्या यह दोनों के हित में न होगा कि कुशल व्यक्ति केवल जूतों का उत्पादन करे और कम कुशल व्यक्ति टोपियां ही बनाएं।”

प्रो० ओहलिन ने भी इसी भावना को व्यक्त किया है और कहा है कि जो बात एक व्यक्ति, ग्राम, जिला अथवा देश के लिए सही है वही विभिन्न राष्ट्रों के बीच व्यापार के लिए भी सत्य है। प्रो० ओहलिन के शब्दों में, “क्षेत्रों एवं राष्ट्रों के द्वारा एक दूसरे के साथ व्यापार एवं विशिष्टीकरण उन्हीं कारणों से किया जाता है जिनसे कि व्यक्ति विशिष्टीकरण करते हैं और व्यापारों में भाग, लेते हैं। कुछ व्यक्ति अपने स्वभाव में किसी कार्य को करने में दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक योग्य होते हैं। उदाहरणार्थ, एक व्यक्ति अच्छा बागवान होता है, जबकि दूसरा अच्छा अध्यापक एवं तीसरा कुशल चिकित्सक। यदि बागवान से अध्यापक कार्य करने को कहा जाय तो वह अध्यापक का कार्य कुशलता से न कर सकेगा। इसी प्रकार अध्यापक एक अकुशल चिकित्सक और एक चिकित्सक अकुशल अध्यापक ही प्रमाणित होगा। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि विशिष्टता सभी पक्षों को लाभकारी है। यदि व्यक्ति योग्यताओं में समान हों तो भी विशिष्टीकरण करना लाभदायक रहेगा।” एक देश में विभिन्न प्रान्त, विभिन्न जिले, विभिन्न वस्तुओं में विशिष्टीकरण करते हुए देखे जाते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि सापेक्षिक लाभ अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में नहीं पाया जाता है, बल्कि यह विशेषता क्षेत्रीय एवं अन्तर्खेत्रीय-व्यापार में भी पाया जाता है। जैसा कि परटो ने लिखा है, “सापेक्षिक लागतों का विचार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए ही विशेषता नहीं रखता बल्कि इसे उन व्यक्तियों में लागू किया जा सकता है जो एक आर्थिक इकाई के अन्तर्गत रहते हैं।” अतः सापेक्षिक या तुलनात्मक लागत के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय और आन्तरिक-व्यापार में भेद करना गलत है, क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय-व्यापार का कारण भी सापेक्षिक लाभ ही है।

(2) उत्पादन के साधन देश के अन्दर भी पूर्णतया गतिशील नहीं होते और न विभिन्न देशों के बीच पूर्णतया गतिहीन होते हैं- प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने उत्पादन के साधनों की गतिहीनता के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के पृथक सिद्धान्त बनाने पर जोर दिया, यह राष्ट्रीय व्यापार भी लागू होता है क्योंकि एक देश में विभिन्न प्रदेशों के बीच भी साधनों की गतिशीलता पूर्ण नहीं पाई जाती है। उदाहरणार्थ एक देश के कृषि श्रमिक उद्योगों में कार्य करने के लिए तैयार नहीं होते हैं और कारखानों के श्रमिक खेतों पर कार्य करने को तैयार नहीं होंगे। इसी प्रकार उत्तरी तथा दक्षिणी भारत के श्रमिक गतिशील नहीं होते हैं। भाषा, धर्म, जाति तथा जलवायु के अन्तर के कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी साधन गतिहीन होते हैं। प्रो० ओहलिन के अनुसार बहुत से कारणों से उत्पादन के साधन देश के अन्दर भी पूर्णतया गतिशील नहीं होते हैं। देश के विभिन्न भागों में ब्याजदरों एवं मजदूरी की असमानताएं इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि साधन पूर्णतया गतिशील नहीं हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि देश के अन्दर और विभिन्न देशों के बीच उत्पादन के साधनों की गतिशीलता में अन्तर के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक पृथक सिद्धान्त की आवश्यकता नहीं है।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय एवं अन्तर्क्षेत्रीय सभी विनिमय अन्ततः हस्तान्तरण ही है- वस्तु विनिमय की स्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय व्यापार में अन्तर करना सही नहीं है क्योंकि दोनों  में ही अन्ततः वस्तु विनियम ही है। यदि मुद्रा के माध्यम को हटा दिया जाये तो समस्त व्यापार वस्तु विनिमय ही रहता है। प्रो० कैनन के शब्दों में “अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के संबंध में यह जोर देने की मूर्खता का हमें परित्याग कर देना चाहिये कि वह वास्तव में वस्तु विनिमय मात्र है। नि:संदेह यदि मुद्रा को नाटक से बाहर निकाल दिया जाये तो समस्त व्यापार का आधार हो वस्तु विनिमय होगा। ऐसी स्थिति में एक प्रकार की वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करने वाले व्यक्ति दूसरे व्यक्ति द्वारा उत्पादित वस्तु तथा सेवा प्राप्त करते हैं। यह केवल मुद्रा है जो वस्तुओं के विनिमय के स्थान पर क्रय-विक्रय की प्रक्रिया शुरू करती है।

(4) विदेशी विनिमय की समस्या अन्तर्राष्ट्रीय एवं अन्तर्क्षेत्रीय व्यापार के बीच भेद का पर्याप्त आधार नहीं है- प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार विदेशी विनिमय संबंधी कठिनाइयां विदेशी व्यापार या अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण उत्पन्न होती है, इसलिए एक पृथक सिद्धान्त द्वारा ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का अध्ययन करना आवश्यक है, न कि राष्ट्रीय व्यापार में। राष्ट्रीय व्यापार में भी पुराने समय में विभिन्न रियासतों में विभिन्न मुद्राओं के चलन के कारण यह सहायता उत्पन्न होती थी।

इस विषय पर प्रो० ओहलिन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है, “चलनों (Currencies) का अन्तर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और राष्ट्रीय व्यापार के सिद्धान्तों में अन्तर सूचित नहीं करता, बल्कि एक बाजार के मूल्य-सिद्धान्त और कई बाजारों के मूल्य-सिद्धान्तों के अन्तरों का संकेत है।”

निष्कर्ष-

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि अन्तक्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय-व्यापार में कोई मौलिक अन्तर नहीं है और जो कुछ अन्तर है वह किस्म (Kind) का नहीं बल्कि (Degree) का है। इसलिए जो सिद्धान्त अंतक्षेत्रीय व्यापार के विश्लेषण के लिए प्रयुक्त किया जाता है उसी को अन्तर्राष्ट्रीय-व्यापार के विश्लेषण के लिए भी प्रयुक्त किया जाना चाहिए। आधुनिक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सामान्य सन्तुलन के सिद्धान्त को ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की व्याख्या करने के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए, इसके लिए पृथक सिद्धान्त की आवश्यकता नहीं है। प्रो० हैबलर ने बताया कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सिद्धान्त को सामान्य-सन्तुलन सिद्धान्त का विशिष्ट प्रयोग समझना चाहिए।

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Pankaja Singh

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