विपणन प्रबन्ध

अन्तर्राष्ट्रीय विपणन | अंतर्राष्ट्रीय विपणन की प्रमुख क्रियायें | अंतर्राष्ट्रीय विपणन का महत्व | International Marketing in Hindi | Main Activities of International Marketing in Hindi | Importance of International Marketing in Hindi

अन्तर्राष्ट्रीय विपणन | अंतर्राष्ट्रीय विपणन की प्रमुख क्रियायें | अंतर्राष्ट्रीय विपणन का महत्व | International Marketing in Hindi | Main Activities of International Marketing in Hindi | Importance of International Marketing in Hindi

अन्तर्राष्ट्रीय विपणन

(International Marketing)

साधारणतः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्पन्न की जाने वाली विपणन क्रियाओं को अन्तर्राष्ट्रीय विपणन कहते हैं। इस प्रकार का विपणन देश की सीमाओं के अन्दर नहीं किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय विपणन विश्व में अलग-अलग देशों के बीच व्यापार प्रवृत्ति (आयात तथा निर्यात प्रवृत्तियाँ) से सम्बन्धित है। इनके अन्तर्गत अलग-अलग देशों की व्यापार नीतियों तथा व्यापार व्यवहारों पर विचार भी शामिल है। इसका कारण यह है कि, “इसके द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रेता – विक्रेता सम्बन्धों को निर्धारित तथा नियंत्रित किया जाता है।”

बैकमेन तथा डेविसन के अनुसार, “अंतर्राष्ट्रीय विपणन से आशय उन समस्त क्रियाओं के विपणन से है जो एक से अधिक राष्ट्रों में अनेक बाजारों की इच्छाओं तथा आवश्यकताओं का निर्धारण करने, उत्पादन उपलब्धता की योजना बनाने, उत्पादों का प्रभावी स्वामित्व हस्तान्तरण करने, उनका भौतिक विपणन करने तथा अन्य विपणन क्रियाओं को सुविधाजनक बनाने से सम्बन्ध रखता है।”

हैस तथा कटेओरा के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय विपणन उन सभी व्यावसायिक क्रियाओं का निष्पादन है जिससे एक से अधिक देशों के उपभोक्ताओं या प्रयोक्ताओं की ओर वस्तुएँ तथा सेवाएँ प्रभावित की जाती है।”

अंतर्राष्ट्रीय विपणन की प्रमुख क्रियायें

(Main Activities of International Marketing)

अन्तर्राष्ट्रीय विपणन में प्रमुख रूप से निम्न क्रियायें सम्मिलित होती हैं-

  1. बाजार एवं वस्तु का चुनाव- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सबसे पहले बाजार को चुनने का कार्य किया जाता है। यह कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। सारी व्यापारिक क्रियाएँ इसी पर ही निर्भर हैं क्योंकि इसके उचित चुनाव से जोखिम में कमी हो जाती है। इसी प्रकार वस्तु का चुनाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वस्तु के साथ ब्राण्ड नाम, पैकेजिंग व लेबिल भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यह सभी विदेशी बाजार के अनुरूप होने चाहिए। विदेशी बाजार विभिन्न प्रकार के होते हैं अतः वस्तु, जो वहाँ बेची जानी है, भी उस देश की आवश्यकता के अनुरूप होनी चाहिए।
  2. बाजार प्रवेश- विदेशों के बाजारों में प्रवेश करना आसान नहीं है। अतः इसके लिए कई तरीके हैं जिनमें से एक है संयुक्त साहस। वर्तमान में यह पद्धति बहुत अधिक प्रचलित है। इसमें निर्यातकर्ता या आयातकर्त्ता एक संघ बना लेते हैं। कभी-कभी विदेशियों के सहयोग से उन देशों में सहयोग स्थापित कर लिए जाते हैं।
  3. मूल्य- ममूल्य, वस्तु के बेचने में एक महत्वपूर्ण घटक है। वैसे तो देशी अन्तर्राष्ट्रीय विपणन में मूल्य सम्बन्धी सिद्धान्त एक ही है, लेकिन फिर भी प्रत्येक देश की व प्रत्येक जिले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही मूल्य निर्धारित किया जाना चाहिए। मूल्य निर्धारण अल्पकालिक व वीर्घकालिक हो सकता है। जब व्यापार अल्पकालिक होता है तो लागत + (Cost – Plus) का सिद्धान्त अपनाया जाता है, लेकिन इसके विपरीत जब व्यापार दीर्घकालिक होता है तो बाजार अभिमुखी (Market- Oriented) मूल्य नीति अपनाई जानी चाहिए।
  4. विपणन संचार- विपणन संचार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में एक महत्वपूर्ण घटक है। इसके लिए विज्ञापन, व्यापार संवर्द्धन व वैयक्तिक विक्रय का सहारा लिया जाता है लेकिन यह सब इस प्रकार होना चाहिए कि वह उस विदेशी बाजार व विदेशी श्रोतागण के अनुरूप हो। इसके लिए भाषा व चिन्ह भी उसी अनुरूप होने चाहिए।
  5. वितरण माध्यम- एक अन्तर्राष्ट्रीय विपणनकर्ता को वितरण माध्यम का पूरा ज्ञान होना चाहिए। यह ज्ञान दो प्रकार का होता है – एक तो देश के भीतर का वितरण माध्यम व दूसरे एक देश से दूसरे देश के लिए नया वितरण माध्यम है। इस कार्य में अनेक मध्यस्थ आते हैं। जितने वितरण मध्यस्थ कम होते हैं लागत उतनी ही कम होती है।
  6. प्रक्रिया जटिलता- विदेशी व्यापार में अनेक जटिलताएँ हैं। कहीं आयात-निर्यात लाईसेन्स की तो कहीं कस्टम व विदेशी विनिमय की। कहीं प्रलेखों की तो कहीं बीमा आदि की। एक विपणनकर्ता को इन प्रक्रिया जटिलताओं का पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए जिससे कि अन्तर्राष्टीय विपणन में आसानी रहे।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय विपणन के लिए संगठन- सामान्यतया प्रारम्भिक अवस्था में तो संस्था- अपना माल स्वंय ही विदेशों को भेजती है, लेकिन जब व्यापार बढ़ जाता है तो अलग से एक विभाग निर्यात विभाग के नाम से बना दिया जाता है जिसमें उस विभाग का प्रबन्धक व उसके कुछ सहायक होते हैं, परन्तु जब व्यापार में और वृद्धि हो जाती है और नए-नए देशों से व्यापार होने लगता है तो संस्था निर्यात विभाग के स्थान पर अन्तर्राष्ट्रीय विभाग बना देती है, लेकिन जब संस्था और आगे बढ़ जाती है तो वह बहुराष्ट्रीय निगम का रूप ले लेती है।
  8. विपणन अनुसंधान – विपणन नियोजन का आधार विपणन अनुसंधान होता है। बिना उचित विपणन अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में कभी भी सफलता नहीं मिल सकती है। अतः आवश्यक है कि विदेशी व्यापार सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ नियमित रूप से एकत्रित की जाएं तथा उन्हें समय-समय पर अद्यतन किया जाए। इसके लिए छपे हुए साहित्य से सहायता ली जा सकती है या फिर स्वयं बाजार सर्वेक्षण किया जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय विपणन का महत्व

(Importance of International Marketing)

अंतर्राष्ट्रीय विपणन का महत्व निम्नलिखित हैं-

  1. अन्तर्राष्ट्रीय विपणन से भिन्न भिन्न देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय विपणन से अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना जन्म लेती है।
  3. उपक्रम का विकास होता है।
  4. उत्पादन में तथा प्रतिव्यक्ति में वृद्धि होती है।
  5. प्रबन्धकीय चातुर्य के विकास में सहायता मिलती है।
  6. एक फर्म अपने लाभदायक विक्रय परिमाण को बढ़ा सकती है।
  7. प्रेरणाओं का लाभ प्राप्त होता है।
  8. विद्यमान क्षमता का पूर्ण उपयोग तथा विस्तार होता है।
  9. देशी बाजारों में प्रतियोगिता होती है।
  10. जीवन स्तर में वृद्धि होती है।
  11. रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है।
  12. आयातों का भुगतान किया जाता है।
  13. निर्यातों से देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  14. देश की अर्थव्यवस्था के विकास में अन्तर्राष्ट्रीय विपणन एक गतिशील घटक का कार्य करता है।
  15. देश का तीव्र आर्थिक विकास होता है।
  16. देश की राष्ट्रीय आय में भी निर्यातों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  17. अन्तर्राष्ट्रीय विपणन के द्वारा अच्छी किस्म के माल तथा वस्तुएँ विदेशी क्रेताओं तक पहुंचती है।
  18. अन्तर्राष्ट्रीय विपणन में वृद्धि करके एक देश अपने यहाँ विद्यमान प्राकृतिक संसाधनों का लाभदायक उपयोग कर सकता है।
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Pankaja Singh

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