अर्थशास्त्र

अंकटाड की उपलब्धियाँ | अंकटाड की असफलतायें | अंकटाड और भारत

अंकटाड की उपलब्धियाँ | अंकटाड की असफलतायें | अंकटाड और भारत

अंकटाड की उपलब्धियाँ

(Achievements of UNCTAD)

जब तक अंकटाड के 7 सम्मेलन हो चुके हैं जिनमें अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विकासशील देशों को सुविधा देने, उनके विदेशी व्यापार को बढ़ाने और विकास कार्यक्रमों में सहायता देने सम्बन्धी समस्याओं पर गहराई से विचार-विमर्श हुआ। विकसित एवं विकासोन्मुख देशों के हितों के टकराव के बावजूद अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये। यद्यपि इन सम्मेलनों से विकासशील देशों को कोई विशेष उपलब्धि तो नहीं हुई, तथापि विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य पहले की अपेक्षा अधिक सूझ-बूझ का निर्माण हुआ है। अंकटाड की प्रमुख सफलताओं व उपलब्धियों को संक्षेप में नीचे प्रस्तुत किया गया है-

(1) आर्थिक समस्याओं पर विचार के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच प्रस्तुत करना- अंकटाड ने आर्थिक समस्याओं पर खुलकर विचार-विमर्श करने के लिए एक अन्तराष्ट्रीय मंच प्रस्तुत किया है तथा विभिन्न देश पारस्परिक जरूरतों को अधिक निकटता से समझने लगे हैं।

(2) सहायता-स्तर का निर्धारण- विकसित देशों ने अपने राष्ट्रीय उत्पादन का न्यूनतम 1% भाग विकासशील देशों को आर्थिक सहायता के रूप में देना सिद्धांतत: स्वीकार कर लिया है। वे वर्तमान सहायता स्तर को कम तो नहीं कर सकते, हाँ उसे बढ़ाने का प्रयत्न ही कर सकते हैं। अंकटाड सम्मेलन उन्हें इसका बार-बार ध्यान दिलाता रहता है।

(3) अधिमानों की सामान्य योजना के अन्तर्गत रियायतें व सुविधायें- विकसित देशों ने विकासशील देशों की वस्तुओं (विशेषतया निर्मित एवं अर्द्ध-निर्मित वस्तुओं) के लिए अधिमानों की सामान्य योजना के अन्तर्गत रियायती दरों पर कर आदि सुविधायें देना स्वीकार किया है। ये रियायतें 10 वर्ष के लिए थीं परन्तु अंकटाड-IV में 10 वर्ष आगे के लिए बढ़ा दी गई हैं।

(4) ऋण भार में राहत देने पर सिद्धान्त सहमति- विकसित देशों ने विकासशील देशों को ऋण भार में राहत देने की बात स्वीकार कर ली है परन्तु कितनी, कब और किस प्रकार दी जाय इस विषय में कोई निर्णय नहीं लिया है। वे प्रत्येक देश में अलग-अलग समस्या समझकर भविष्य में विचार करेंगे।

(5) विकासशील देशों के भुगतान सन्तुलनों में घाटों के प्रति सहानुभूति एवं सहायता- विकासशील देशों की भुगतान सन्तुलन सम्बन्धी कठिनाइयों और विकास वित्त सम्बन्धी आवश्यकतओं के प्रति विकसित देशों में अधिक सहानुभूति उत्पन्न हुई है और इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय वित्त संस्थाओं के साधनों में वृद्धियाँ की गई हैं तथा उनकी उदार ऋण देने सम्बन्धी नई विधियाँ प्रचलित की गई हैं। उदाहरणार्थ, विश्व बैंक समूह के ऋणों में कृषि एवं ग्रामीण विकास कार्यक्रम को विशेष महत्व दिया जाने लगा है।

(6) विकासशील देशों में एकता व सहयोग की भावना का विकास- विकसित देशों के समक्ष अपनी सौदा शक्ति बढ़ाने के लिए विकासशील देशों में एक समूह के रूप में व्यवहार करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ये देश अपना माँग-पत्र तैयार करने हेतु अंकटाड के मुख्य सम्मेलन से पूर्व ही अपनी बैठक आयोजित करते हैं। यद्यपि इन देशों के हित भी आपस में टकराते हैं तथापि वे अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपने कुछ हितों का बलिदान करने को तत्पर रहते हैं। उदाहरणार्थ, भारत ने ‘सामान्य कोष’ के लिए औद्योगिक कच्चे माल की मूल्य वृद्धि का समर्थन किया यद्यपि स्वयं उसे इनके आयात पर अधिक व्यय करना पड़ेगा।

(7) विकासशील देशों की निर्यात-आय बढ़ाने के विषय में सहमति- विकसित देशों ने यह स्वीकार किया कि विकासशील देशों की निर्यात आय में वृद्धि होनी चाहिए, जोकि तभी सम्भव है जबकि इनके निर्यात बढ़ें। निर्यात-आय बढ़ने पर ही वे अधिक आयात कर सकेंगे और अपना ऋण-भार हल्का कर सकेंगे।

(8) अति निर्धन देशों के प्रति विशेष सहायता का कार्यक्रम- सभी देशों ने यह स्वीकार किया है कि विश्व के अति निर्धन और पिछड़े देशों के आर्थिक विकास के लिए विशेष प्रयत्न करने चाहिए।

(9) अनेक द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय समझौते सम्पन्न होना- अंकटाड में समाजवादी गुट के देशों ने भी भाग लिया। इनसे हुए विचार-विमर्श के बाद विकासशील देशों ने इनसे अनेक द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापार समझौते किए हैं।

(10) तकनीकी ज्ञान का हस्तान्तरण आदि- तकनीकी ज्ञान के स्थानान्तरण, समुद्री यातायात में सुधार हेतु जहाजी कम्पनियों के लिए आचार संहिता के निर्माण तथा चारों सीमायें भूमि से घिरे देशों (land locked counries) को समुद्री मार्गों की सुविधाएं दिलाने की दिशा मे सफल प्रयास किए गए हैं।

अंकटाड की सिफारिशों के क्रियान्वयन एवं उपलब्धियों के दृष्टिगत करते हुए विकसित देशों के उत्साह में कमी आई ही क्योंकि व्यापार जगत में अंकटाड पोषित विकासशील देश विकसित देशों के लिए सार्थक प्रतिस्पर्धा का विषय बन रहे हैं। अतः उनकी उदासीनता सहज है।

अंकटाड की असफलतायें

(Failures of UNCTAD)

विकासशील देशों की आवश्यकतओं को देखते हुए अंकटाड की कतिपय सफलतायें कम ही प्रतीत होती हैं। विकसित देश अपने राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके कोई महत्वपूर्ण रियायतें या वित्तीय सुविधायें देने को तैयार नहीं हुए हैं। अंकटाड की असफलताओं को निम्न प्रकार बताया जा सकता है-

(1) न्यूनतम सहायता स्तर को असली रूप न देना- किसी भी विकसित देश ने गत 15 वर्षों में कभी भी अपनी राष्ट्रीय आय का न्यूनतम स्वीकृत 1% वित्तीय सहायता नहीं दी है। (यदि यह ध्यान रखें कि इन राष्ट्रों की आय में इस बीच काफी वृद्धि हो गई है, तो विकास सहायता का 1% और कम पड़ जाता है)।

(2) ऋण भार में वास्तविक कमी न होना- अनेक आश्वासनों के बावजूद विकासशील देशों के ऋण के भार में कोई कमी नहीं हुई है। ब्याज दरें सामान्यतः 7 से 9% तक है जो काफी ऊँची है। उदार शर्तों पर उपलब्ध विकास वित्त की मात्रा आवश्यकता से कहीं कम है। अनुदान राशियाँ तो नाम मात्र हैं। (तेल मूल्यों में हुई वृद्धियों के कारण विकासशील देशों पर ऋण भार बहुत बढ़ गया है)।

(3) निर्यात प्रतिबन्धों में रियायतें अपर्याप्त होना-विकसित देशों ने विकासशील देशों से किए जाने वाले आयातों पर भारी कर लगा रखे हैं, जो रियायतें दी भी हैं वह बहुत ही अपर्याप्त, असमान और राजनैतिक विचारों से प्रभावित हैं। अधिमानों की सामान्य योजना से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है।

(4) जिन विषयों पर सहमति हो गई थी उनमें से कुछ पर (जैसे-तकनीकी ज्ञान के हस्तान्तरण आदि) नियमोपनियम, आचरण संहिता बनाने का कार्य पूरा नहीं हो सका है।

(5) संरक्षणात्मक प्रक्रियाओं में निरन्तर वृद्धि- अंकटाड की एक रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि सन् 1978 में निर्यात बाधाओं की संख्या मात्र 50 थी जो सन् 1989 में बढ़कर 263 हो गई है। ये प्रतिबन्ध मुख्य रूप से विकसित देशों द्वारा विकासशील एवं अल्पविकसित देशों के निर्यातों पर लगाये गए हैं।

(6) विकासशील देशों को शुद्ध आर्थिक सहायता प्रवाह में कमी- नवें दशक के दौरान विकसित देशों से विकासशील देशों को प्राप्त होने वाली शुद्ध आर्थिक सहायता प्रवाह में निरन्तर कमी आयी है। वर्ष 1981 में विकासशील देशों को 201.9 विलियन डालर की शुद्ध सहायता प्राप्त हुई थी जो सन् 1989 में घटकर 111.5 विलियन डालर रह गयी।

(7) विकासशील देशों पर बाह्य ऋणों पर लगातार बढ़ता बोझ- नवें दशक के दौरान विकासशील देशों पर बाह्य ऋणों का बोझ बहुत अधिक बढ़ गया है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1990 के अन्त तक विकासशील देशों पर बाह्य ऋणों का कुल बोझ 1221 विलियन डालर के लगभग होगा।

अंकटाड और भारत

शुरू से ही भारत ने अंकटाड में पर्याप्त रुचि ली है। अंकटाड-II भारत में ही आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन में पिछड़े व विकासशील देशों को संगठित कर विकसित देशों से बराबरी के आधार पर वार्ता करने में भारत ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने विकासशील देशों के संगठन (“77 देश समूह”) की बैठकों में अन्तर्राष्ट्रीय एवं पारस्परिक आर्थिक समस्याओं के विवेचन में सक्रिय भाग लिया और अनेक बार निजी के हितों को त्यागने में भी वह पीछे नहीं रहा। अंकटाड से विकासशील देश जो आशायें करते हैं, उनकी पूर्ति कराने में भारत को निम्नांकित क्षेत्रों में आगे बढ़कर सहयोग देना चाहिए-

(i) विकासशील देशों के आवासी व्यापार को अधिकाधिक बढ़ाना।

(ii) विकासशील देशों के सरकारी व्यापारिक नियमों में पारस्परिक सहयोग बढ़ाना।

(iii) विकासशील देशों में बिक्री बढ़ाने के लिए इनके अपने बहुराष्ट्रीय विपणन उपक्रमों (Multi-national marketing enterprises) की स्थापना।

(iv) क्षेत्रीय, उप-क्षेत्रीय एवं अन्तक्षेत्रीय निर्यात साख एवं गारण्टी योजनाओं को बढ़ाना।

(v) विकासशील देशों में तकनीकी ज्ञान के आपसी आदान-प्रदान को उत्साहित करना।

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Pankaja Singh

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