अर्थशास्त्र

अंकटाड की स्थापना | संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन | संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन का उद्देश्य

अंकटाड की स्थापना | संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन | संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन का उद्देश्य

संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन का उद्देश्य

(Objective of UNCTAD)

हवाना घोषणा और गैट की स्वीकृति से न तो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अपेक्षित वृद्धि हुई और न विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था और व्यापार को ही पर्याप्त प्रोत्साहन मिला। गरीब और समृद्ध ‘देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। इस स्थिति के निराकरण के लिए नए सिरे से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयत्न किए गए। इन प्रयत्नों के परिणामस्वरूप जून 1960 में संयुक्त राष्ट्र-संघ के व्यापार और विकास सम्मेलन का जन्म हुआ।

अंकटाड की विधिवत् स्थापना, कार्य, सदस्यता एवं प्रबन्ध

(Formal Establishment, Function, Membership and Management)

जेनेवा में मार्च, 1964 में आयोजित प्रथम सम्मेलन में 118 देशों के अतिरिक्त गैट, संयुक्त राष्ट्र संघ की विशिष्ट एजेन्सियों (Agencies) एवं अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उस समय (मार्च-जून) में अंकटाड को स्थायी रूप देने का विचार न था, किन्तु दिसम्बर 1964 में राष्ट्र संघ की एक स्थायी एजेन्सी के रूप में इसे मान लिया गया एवं एक स्थायी सचिवालय बना दिया गया व एक स्थायी महासचिव भी नियुक्त कर दिया गया। अंकटाड में लिए गए निर्णयों को एक कानून में सम्मिलित कर दिया गया।

अंकटाड के निम्न कार्य भी निश्चित किए गए-

अंकटाड के कार्य

(1)अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन देना- आर्थिक विकास की दृष्टि से विभिन्न श्रेणियों के देशों (विकासोन्मुख एवं विभिन्न सामाजिक संगठन वाले देशों) के बीच व्यापार का विस्तार होना चाहिए।

(2) नीतियों को निर्धारित एवं कार्यान्वित करना-अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक विकास से सम्बन्धित समस्याओं के बारे में अंकटाड सिद्धान्त व नीतियाँ निर्धारित करेगा तथा इनको कार्यान्वित करने के लिए सुझाव देगा।

(3) विभिन्न संगठनों के मध्य समन्वय करना- संयुक्त राष्ट्र संघ से सम्बद्ध अन्य संगठनों के साथ समन्वय (Co-ordination) स्थापित करना।

(4) बहुपक्षीय व्यापार-संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य उपयुक्त संस्थाओं को बहुपक्षीय व्यापार (Multilateral trade) के लिए मन्त्रणायें आयोजित करने हेतु तैयार करना।

(5) क्षेत्रीय नीतियों में समन्वय लाने के केन्द्र के रूप में कार्य- विभिन्न सरकारों और क्षेत्रीय आर्थिक गठबन्धनों की व्यापार व आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों में समन्वय की स्थापना के लिए एक केन्द्र के रूप में कार्य करना।

अंकटाड की सदस्यता एवं प्रबन्ध

अंकटाड की सदस्यता संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देशों, अन्तर्राष्ट्रीय आणविक शक्ति एजेन्सी एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य विशिष्ट एजेन्सियों के लिए भी खुली है। प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार है। सामान्य महत्व के मसलों पर उपस्थित सदस्यों के बहुमत के आधार पर और महत्वपूर्ण मसलों पर दो तिहाई बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।

अंकटाड के स्थायी बंदोबस्त के लिए एक ‘व्यापार एवं विकास मण्डल’ (Trade and Development Board) बनाया गया है। इस बोर्ड में कुल 55 सदस्य हैं। इसकी बैठक वर्ष में कम से कम दो बार अवश्य होती है। प्रशासन की सुविधा हेतु इस बोर्ड में चार समितियाँ भी गठित की गई हैं जो निम्न विषयों के बारे मे नीति निर्देश तैयार करती हैं-

(i) वस्तुएँ (प्राथमिक एवं कृषिजन्य),

(ii) औद्योगिक (विनिर्मित वस्तुएँ),

(iii) जहाजरानी एवं अदृश्य व्यापार तथा

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वित्तीय प्रबन्ध ।

वर्तमान में UNCTAD के सदस्यों की संख्या 140 हो गई।

अंकटाड का मुख्यालय जेनेवा में रखा गया है। साधारण सभा तीन वर्ष में कम से कम एक बार बुलाई जाती है।

अंकटाड-प्रथम (UNCTAD-I)

अंकटाड का पहला अधिवेशन सन् 1964 में जेनेवा में हुआ। 77 विकासोन्मुख देशों को, जिन्होंने अंकटाड प्रथम में भाग लिया था ‘Group of 77’ (77 देश समूह) की संज्ञा दी गई है। इन देशों ने अपनी विदेशी व्यापार सम्बन्धी कठिनाइयाँ प्रस्तुत की और बताया कि विकसित देशों ने जो दोषपूर्ण नीतियां अपनाई हैं उनका कितना कटु प्रभाव उन पर पड़ रहा है। उन्होंने आशा प्रकट की कि अधिवेशन द्वारा की जाने वाली अन्तिम सिफारिशें विकास हेतु एक नयी व्यावहारिक नीति का शुभारम्भ करेंगी।

अंकटाड प्रथम द्वारा निर्धारित सिद्धान्त

अंकटाड प्रथम की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें विकासोन्मुख देशों ने अन्तराष्ट्रीय व्यापार के नए सिद्धान्तों एवं विकास की समस्या के प्रति एक नया दृष्टिकोण स्वीकार करने हेतु विकसित देशों को बाध्य कर दिया। अंकटाड प्रथम के अन्तिम अधिनियम में 15 सामान्य और विशेष सिद्धान्तों का समावेश किया गया है। विकासोन्मुख देशों की प्रत्यक्ष रुचि के सामान्य सिद्धान्त निम्नांकित हैं-

(1) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन विकासोन्मुख देशों की आवश्यकताओं के अनुसार- राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों का उद्देश्य विकासोन्मुख देशों की आवश्यकताओं व रुचियों के अनुसार ही अन्तर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन सम्भव बनाना चाहिए।

(2) पारस्परिक सहयोग एवं व्यापार में विविधता-विकासोन्मुख देशों की निर्यात-आय तेजी से बढ़ाने हेतु अनुकूल वातावरण तभी बन सकता है जबकि सभी देश परस्पर सहयोग की भावना रखें और विशिष्टीकरण (Specialisation) के बजाय व्यवहार में विविधता (Diversifi- cation) लाने का प्रयास करें।

(3) विकासोन्मुख देशों के निर्यातों पर से प्रतिबन्ध हटाना- विकसित देश विकासोन्मुख देशों के निर्यातों पर विद्यमान प्रतिबन्धों और उनके व्यापार में आने वाली बाधाओं को प्रगतिशील रूप से (Progressively) कम करें और इनके निर्यातों की वृद्धि हेतु अनुकूल वातावरण बनाने में सक्रिय सहयोग दें। सभी देश संयुक्त रूप से ऐसे पग उठायें जिनसे प्राथमिक वस्तुओं के निर्यात बढ़े अथवा कम से कम स्थिर तो रहें ही और इस आशय की सिद्धि के लिए एक ऐसी न्यायोचित मूल्य प्रणाली लागू करनी होगी, जिसमें प्राथमिक और औद्योगिक वस्तुओं के मूल्य दोनों विकसित एवं विकासोन्मुख देशों को स्वीकार्य हों।

(4) विकासोन्मुख देशों को बिना शर्त लगाये रियायतें देना- विकसित देश सभी विकासोन्मुख देशों को रियायतें देने की घोषणा करें और जो रियायतें उन्होंने परस्पर दी हुई हैं, उन्हें भी विकासोन्मुख देशों पर लागू करें किन्तु ऐसी शर्त न लगायें कि विकासोन्मुख देश भी उन्हें रियायतें दें। प्रशुल्क एवं गैर-प्रशुल्क दोनों भाँति की नई रियायतें (Tariff and non-Tariff concessions) सभी विकासोन्मुख देशों को दी जानी चाहिए किन्तु ऐसी प्राथमिकताएँ विकसित देशों को न दी जाएँ।

(5) वित्तीय सहायता के लिए राशि का निर्धारण- प्रत्येक विकसित देश अपने कुल राष्ट्रीय उत्पादन (GNP) का कम से कम 1% भाग विकासोन्मुख देशों की वित्तीय सहायता के लिए दें और सहायता सम्बन्धी शर्तों को आसान बनाएं ताकि ब्याज का भार न्यूनतम पड़े।

अंकटाड-द्वितीय (UNCTAD-II)

अंकटाड द्वितीय के उद्देश्य

अंकटाड प्रथम के अधिनियम में निहित नीतियों व सिफारिशों को धीमी गति से कार्यान्वित किया गया, जिसको देखते हुए अंकटाड द्वितीय (1968) के निम्न तीन उद्देश्य निर्धारित किए गए-(i) आर्थिक स्थिति का फिर से अवलोकन करना, (ii) मन्त्रणाओं के माध्यम से विशिष्ट परिणामों को प्राप्त करना और (iii) किसी समझौते या निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व विषय का सविस्तार अध्ययन एवं सम्बद्ध मसले की जाँच करना।

अल्जीयर्स चार्टर (The Charter of Algiers)

अंकटाड द्वितीय के आयोजन के पूर्व अक्टूबर 1967 में 77 देश समूह की अल्जीयर्स में एक बैठक हुई। इस बैठक में अंकटाड द्वितीय के लिए विकासोन्मुख देशों की रणनीति (Strategy) तय की गई और जो कार्यक्रम तैयार किया गया उसे ‘चार्टर ऑफ अल्जीयर्स’ (The Charter of Algiers) कहा जाता है। चार्टर में उन कार्यक्रमों का विवरण था जो कि अंकटाड द्वितीय के समक्ष आवश्यक और तत्काल क्रियान्वयन (Immediate enforcement) हेतु रखे जाने थे। इनमें निम्न बातें सम्मिलित थीं-

(i) कोको और शक्कर के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समझौते करने का आग्रह करना,

(ii) महत्वपूर्ण प्राथमिक वस्तुओं में बफर स्टाक बनाने के हेतु अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा प्रारम्भिक वित्तीय व्यवस्था करना एवं विकसित देशों द्वारा उत्पादित प्राथमिक वस्तुओं का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विकासोन्मुख देशों को भी अवसर देना,

(iii) विकासोन्मुख देशों से निर्यातित निर्मित माल अर्द्ध-निर्मित वस्तुओं के सम्बन्ध में विकसित देशों से भेदभाव रहित एवं परस्परता की शर्त रहित प्रशुल्क नीति का आग्रह” करना,

(iv) 1970 तक अपने कुल राष्ट्रीय उत्पादन का 1% विकासोन्मुख देशों को दें ऐसा आग्रह विकसित देशों से करना।

अंकटाड द्वितीय उपलब्धियाँ व सिफारिशें

कुल पर, अंकटाड द्वितीय असफल रहा, क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विकास हेतु किसी भी नीति के निर्माण में इसने योग नहीं दिया। इस पर जो न्यून सफलताएँ मिलीं, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

(1) प्रशुल्क-प्राथमिकतायें- अंकटाड द्वितीय के अन्तर्गत प्रशुल्क प्राथमिकताओं (Tariff preferences) सम्बन्धी एक नई स्कीम पर विचार किया गया। कोई विशेष कदम तो इस दिशा में नहीं उठाया गया किन्तु सैद्धान्तिक रूप से सब देश इस बात से सहमत हुए कि विकासोन्मुख देशों. के सम्बन्ध में भेदभाव रहित एवं गैर-परस्परता वाली प्रशुल्क प्राथमिकता नीति अपनानी चाहिए। विकसित देशों के रुख में इस किंचित परिवर्तन को भी विकासोन्मुख देशों ने शुभ लक्षण माना।

अंकटाड द्वितीय के अधिनियम में प्राथमिकताओं सम्बन्धी एक विशेष समिति की नियुक्ति का प्रावधान था। नई व्यवस्था के लिए विकसित एवं विकासोन्मुख देशों के मध्य मन्त्रणाओं के आयोजन का भी प्रस्ताव था। सन् 1971 में एक स्कीम आरम्भ की गई जिसके अन्तर्गत विकासोन्मुख देशों से निर्यातित निर्मित वस्तुओं को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया।

(2) वस्तु समझौते- वस्तु समझौते के बारे में जो 16 प्रस्ताव रखे गये थे उनमें से 5 प्राथमिक वस्तुओं के लिए यह तय हुआ कि इनके निर्यात हेतु विकसित देश विकासोन्मुख देशों को अधिक रियायतें व सुविधायें देंगे। ये वस्तुयें हैं कोको, शक्कर, प्राकृतिक रबड़, तिलहन एव चर्बी।

(3) आर्थिक एवं वित्तीय सहायता- अंकटाड द्वितीय में बन्धन युक्त (Conditional) सहायता को सीमित रखने और बन्धन रहित (Un-Conditional) आर्थिक सहायता को अधिकाधिक बढ़ाने के सम्बन्ध मे निर्णय लिए गए। विकासोन्मुख देशों का सुझाव था कि सरकारी सहायता का 80% भाग अनुदान के रूप होना चाहिए या सरकारी सहायता का 90% भाग 2.5% या इससे कम ब्याज पर दिया जाना चाहिए तथा ऐसे ऋणों की वापसी के लिए न्यूनतम अवधि 30 वर्ष हो और इसमें रियायती अवधि 8 वर्ष की हो, ऋण देने की विधियों, विशेषतया ऋण-वापसी समय में सुधार हेतु अनुसंधान कराने का भी सुझाव था। विकासोन्मुख देशों की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को अनुभव करते हुए विकसित देशों ने यह आश्वासन दिया कि वे निकट भविष्य में यह यथासम्भव अपने कुल राष्ट्रीय उत्पादन का कम से कम 1% भाग विकासशील देशों को आर्थिक सहायता के रूप में देंगे।

(4) क्षतिपूरक सहायता- क्षतिपूरक वित्तीय सहायता (Compensatory finance) के हेतु अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जो कदम उठाये, उनके प्रति सन्तोष व्यक्त करते हुए इस अधिवेशन में निम्न सिफारिशें भी प्रस्तुत की गईं-(i) जब विकासोन्मुख देशों द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं के मूल्य बढ़ने लगे, तब उन्हें क्षतिपूरक सहायता का लाभ मिलना। (ii) आवेदक सदस्य देश को मुद्रा कोष द्वारा आबंटित कोटे का 50% तरन्तु मिलना चाहिए और इसके लिए कोई शर्त नहीं लगानी चाहिए। (iii) इस सुविधा के अन्तर्गत प्राप्त ऋणों की वापसी ऋण लेने की तिथि से 5 वर्ष बाद तक आरम्भ न होनी चाहिए और इसके बाद भी उसी वर्ष किस्तों व ब्याज का भुगतान किया जाना चाहिए जबकि सम्बद्ध देश के निर्यात के अपेक्षित निर्यात से आधिक्य की 50% से अधिक न हो। (iv) क्षतिपूक सहायता के अन्तर्गत दिए गए ऋणों पर ब्याज दर का आंकलन इस तरह से किया जाय कि ऋणी देशों पर न्यूनतम भार पड़े।

(5) व्यावसायिक साख- पिछले वर्षों में व्यावसायिक साख की दिशा में कुछ प्रगति हुई है। ऐसी साख साधनों के प्रवाह की गति तो बढ़ाती है और एक सीमा तक आर्थिक विकास की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण योग देती है मुद्रा कोष से ऐसी साख के विषय में विश्व बैंक और अंकटाड सचिवालय की सहायता से अध्ययन करके रिपोर्ट देने का अनुरोध किया गया।

(6) जहाजरानी एवं बीमा- विकसित देशों से अनुरोध किया गया कि विकासोन्मुख देशों की जहाजरानी क्षमता के विस्तार के लिए अधिक उदारतापूर्वक आर्थिक सहायता दें, स्थगित भुगतानों (Deferred payments) के आधार पर उन्हें जहाज बेचें और ऐसे स्थगित भुगतानों पर ब्याज की दर अत्यन्त कम रखे, जिन मार्गों और वस्तुओं पर जहाज भाड़े की दरें अधिक हों, उनको कम करने हेतु सम्मेलन बुलाएं। बीमे के सम्बन्ध में सुझाव दिया गया कि बीमा और पुनर्बीमा के लिए विकासोन्मुख देशों से कम से कम प्रीमियम लिया जाय। पर्यटन के विस्तार, जहाजरानी के क्षेत्र में तकनीकी सहायता, जहाज पर लदान की शर्तों और अन्तर्राष्ट्रीय जहाजी कानून पर जहाजरानी समिति के तत्वावधान में एक कार्यशील दल की नियुक्ति आदि के बारे में भी सिफारिशें की गईं।

(7) एकान्त प्रदेश- एकान्त प्रदेशों (Land locked countries) में परिवहन एवं संचार, सुविधाओं के विकास हेतु विशेष सहायता प्रदान करने के लिए विकसित देशों एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से अनुरोध किया गया। यह निश्चय किया गया कि ऐसे देशों को विकासोन्मुख देशों के समूह में न्यूनतम विकसित क्षेत्र मानते हुए इनकी आवश्यकताओं को उच्च प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाय।

अंकटाड-तृतीय (UNCTAD-III)

अंकटाड तृतीय से पूर्व सन् 1971 में “77 देश समूह” के मन्त्रियों की वार्ता बैंकाक में हुई। इस वार्ता के दौरान एशियाई देशों के नेताओं ने चेतावनी दी कि विश्व में उभर रहे मौद्रिक संकट और विकसित देशों में बढ़ रही.संरक्षण-प्रवृत्ति के कारण विकासोन्मुख देशों के निर्यात व्यापार को ठेस पहुँचेगी ही, साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को भी क्षति पहुँचेगी। उन्होंने एक ‘संघर्ष के कार्यक्रम’ (Programme of Action) की घोषणा की, जिसमें उन उपायों का उल्लेख था जो कि व्यापार एवं आर्थिक विकास के विस्तार हेतु प्रयोग किए जाने चाहिए।

अंकटाड-III के निर्णय

अंकटाड-तृतीय में 140 देशों के 300 राजनीतिज्ञों एवं अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न मन्त्रालयों में भाग लिया। मुख्य विषय धनी एवं निर्धनों देश के बीच बढ़ते हुए अन्तर का था। रोबर्ट मेक्नमारा ने इस अन्तर को घटाने पर बल दिया। लम्बे विचार-विमर्श के बाद अंकटाड-तृतीय में निम्नांकित निर्णयों पर सहमति व्यक्त की गई-

(1) विकसित देश विकासोन्मुख देशों की अर्थव्यवस्था के विविधीकरण के लिए सहायता देना जारी रखें।

(2) वस्तु समझौतों पर विशेष ध्यान दिया जाय।

(3) जहाजरानी एवं बन्दरगाह-सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाय ताकि विकासशील देशों में परिवहन लागतें कम की जा सकें।

(4) विकासोन्मुख देशों के निर्यात बढ़ाने हेतु विशेष कदम उठाये जाएँ।

(5) विश्व बैंक को चाहिए कि अपने साधनों का अधिक भाग विकासोन्मुख देशों की सहायतार्थ दें।

(6) विश्व के 24% निर्धनतम देशों को प्राथमिकता के आधार पर सहायता दी जाय, ताकि वे अन्य विकासोन्मुख देशों के समकक्ष आ सकें।

अंकटाड-चतुर्थ (UNCTAD-IV)

अंकटाड-चतुर्थ की पृष्ठभूमि- अंकटाड-चतुर्थ का सम्मेलन अफ्रीका में नैरोबी (केनिया) में 4 मई, से 31 मई, 1976 तक के लिए आयोजित किया गया। इसमें 150 देशों के लगभग 3 हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन से आशा की गई कि वह एक नवीन अर्थव्यवस्था (New Economic Order) का सूत्रपात करेगा। यह सम्मेलन निसन्देह एक कठिन पृष्ठभूमि में हो रहा था-विकासशील देशों को तेल मूल्यों की कई गुना मूल्य वृद्धि, अपर्याप्त विदेशी सहायता, विदेशी ऋणों के बढ़ते हुए भार आदि समस्याओं का सामना करना पड़ा रहा था; उनकी आर्थिक दशा अत्यधिक खराब हो गई थी और उनके भुगतान सन्तुलनों में भारी घाटे हो रहे थे। अत: यह स्वाभाविक ही था कि ये देश अपने निर्यातों के लिए अधिक मूल्य, अधिक विदेशी ‘सहायता और ऋण दायित्वों में कमी की माँग करें। दूसरी ओर, विकसित देश अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने की इच्छा से इन मांगों का विरोध कर रहे थे। एक महत्वपूर्ण घटना यह हो गई थी कि मध्यपूर्व के अरब देशों के पास भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा के भण्डार जुड़ गए थे।

नैरोबी सम्मेलन की तैयारी में बैठक में विकासशील देशों की यह शिकायत पुनः उभर कर सामने आयी कि प्रतिशत व्यापार शर्तों तथा विकसित देशों द्वारा दी गई अपर्याप्त आर्थिक सहायता ही उनकी बिगड़ती जा रही दशा के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है। 1975-76 में धनी देशों में रहने घवाले 30 प्रतिशत धनवान लोगों की प्रति व्यक्ति आय निर्धन देशों के 70 प्रतिशत निर्धनों की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक थी। विकासशील देशों का मानना था कि यदि विकसित देशों की नीतियाँ इसी सीमा तक अनुदार रहीं तो स्थिति इससे भी अधिक खराब हो जाएगी।

अंकटाड-चतुर्थ में विचार-विमर्श का दूसरा प्रमुख विषय विकासशील देशों के निम्न निर्यातों से सम्बन्धित था क्योंकि इन वस्तुओं की निर्यातों में अनिश्चितता की स्थिति थीं।

(1) कोको, (2) कॉफी,(3) चाय, (4) शक्कर, (5) ताँबा, (6) टिन, (7) रबर, (8) कपास, (9) जूट, (10) कठोर धागे चूँकि उपर्युक्त वस्तुएँ अनेक विकासशील देशों के निर्यात की प्रमुख वस्तुएँ हैं इसलिए इन देशों की इच्छा थी कि इन वस्तुओं के तटस्थ भण्डार की व्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से की जाय ताकि इनके मूल्यों में होने वाले उच्चावचनों को नियन्त्रित किया जा सके।

अंकटाड-पाँचवां (UNCTAD-V)

अंकटाड-V के मूल उद्देश्य

अंकटाड-V के मूल उद्देश्य निम्न प्रकार थे-(i) विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक समस्याओं पर विचार करना, जैसे-मुद्रा स्फीति, तेल-मूल्यों में वृद्धि, विकास वित्त की आवश्यकतायें, अन्तर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन के स्वरूप में होने वाले परिवर्तन आदि, (ii) अन्तर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय वित्त-संस्थाओं के कार्यकलापों पर विचार करना ताकि इन्हें अधिक उपयोगी बनाया जा सके, (iii) समान आर्थिक हितों और दृष्टिकोणों वाले देशों में एकता व सहयोग की वृद्धि करना। (विकसित एवं विकासशील देश अपने गुट (Blocs) बनाकर अपनी रण नीतियाँ तय करते रहे हैं)।

अंकटाड-v निष्कर्ष एवं सिफारिशें

अंकटाड-V मनीला(फिलीपाइन्स) में 7 मई से 1 जून, 1979 तक आयोजित हुआ और 3 जून, 1979 को इसके निष्कर्ष एवं सिफारिशें प्रकाशित की गई। इस सम्मेलन में उत्तरी व दक्षिणी गोलार्द्ध के 159 देशों ने भाग लिया था, जिस कारण ‘पाँचवें अंकटाड में उत्तर-दक्षिणी विचार- विनिमय (North-South Dialogue at the Vth UNCTAD) भी कहा गया है। विश्व के देश सम्मेलन मे अपने-अपने हितों की रक्षार्थ गुटों मं बँट रहे। “77 देश समूह” (विकासशील देशों का संगठन) में अब लगभग 119 देश शामिल थे। समाजवादी एवं साम्यवादी देशों का अलग गुट था और विकसित देशों का गुट अलग। अंकटाड-V अपने मूल उद्देश्य में ‘विश्व में नई अर्थव्यवस्था की स्थापना हेतु बुनियादी परिवर्तन’ (Structual changes aimed at a New International Order) में असफल रहा। पंचम अंकटाड से वास्तव में यह आशा नहीं की जा सकती थी कि वह एकाएक आर्थिक क्रान्ति ले आयेगा क्योंकि वह क्रमिक सुधारों की लम्बी श्रृंखला के माध्यम से ही प्रगति करता है। उसका महत्व अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों पर विचार-विमर्श करने के लिए यू० एन० ओ० का प्रमुख मंच होने में निहित है। पंचम अंकटाड की प्रमुख सिफारिशें और निष्कर्ष निम्न प्रकार हैं-

(1) प्रमुख आयात-निर्यातों आदि की वार्षिक समीक्षा करना- माँग एवं पूर्ति, सरंक्षण नीतियों के प्रभाव आदि ही सही जानकारी प्राप्त करने के लिए व्यापार एवं विकास मण्डल द्वारा विश्व में उत्पादित प्रमुख वस्तुओं, कच्चे मालों, प्रमुख आयात-निर्यातों की वार्षिक समीक्षा कराई जाय।

(2) संरक्षण करों को घटाना या कम से कम यथावत ही रखना- विकसित देश यदि विकासशील देशों से आयात किये जाने वाले माल पर संरक्षण कर घटाये नहीं तो कम से कम इन्हें यथावत् ही रखे, जिसमें विकासशील देशों के निर्यात-आय बढ़ाने सम्बन्धी प्रयासों को नई बाधाओं से न जूझना पड़े।

(3) अति निर्धन देशों के लाभार्थ विशेष कार्यक्रम- विश्व में अति निर्धन देशों की संख्या 31 निश्चित की गई। इनके विकास हेतु 1980 के दशक में एक विस्तृत नवीन कार्यक्रम (Comprehensive New Programme) घोषित किया गया।

(4) बहुराष्ट्रीय निगमों की गतिविधियों आदि पर विचार- ‘अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रचलित प्रतिबन्धात्मक व्यापार-प्रथाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों की गतिविधियों पर 1979 के अन्त में अधिक विचार किया जायेगा।

(5) IMF का पुनर्गठन- अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पुनर्गठन के विषय पर बहुत विचार विमर्श हुआ। विकासशील देशों ने इस सम्बन्ध में अपनी निम्न माँगें प्रस्तुत की-

(i) मुद्रा कोष अधिक उदारतापूर्वक ऋण दें।

(ii) मुद्रा कोष की विस्तार कोष एवं पूरक-सुविधा (Entended Fund and Supplementary Financing Facility) को अधिक बढ़ाया जाय।

(iii) मुद्रा कोष द्वारा मध्यम अवधि के ऋण देने की सम्भावनाओं पर विचार किया जाय।

(iv) मुद्रा कोष की वर्तमान क्षतिपूरक वित्त-व्यवस्था (Compensatory Financing Scheme) को सुधारा जाय।

(v) विभिन्न देशों की सरकारों के विशेषज्ञों का प्रतिनिधि मण्डल समय-समय पर कोष के सदस्य-देशों की घरेलू मौद्रिक नीतियों की जाँच किया करें।

धनी विकसित देशों ने उक्त सब माँगों को अस्वीकार कर दिया तथा इन पर पुनर्विचार तक का आश्वासन भी नहीं दिया।

(6) सरकारी विकास सहायता के लक्ष्य पर पुनर्विचार- संयुक्त राष्ट्र संघ ने सरकारी विकास सहायता का लक्ष्य कुल राष्ट्रीय उत्पादन का 0.7% निश्चित किया था। इस पर पुनर्विचार हुआ और कई विकसित देशों ने इस लक्ष्य की ओर बढ़ने का आश्वासन दिया (पश्चिमी जर्मनी ने निजी क्षेत्र में विदेशी विनियोग बढ़ाने पर बल दिया)।

(7) ऋण-किस्तों के पुनर्निर्धारण की माँग- विकासशील देशों को ऋण की पूर्व निश्चित किश्तों व ब्याज आदि के भुगतान में बड़ी कठिनाई अनुभव हो रही थी और इसलिए उन्होंने इन किश्तों के पुनर्निर्धारण की मांग रखी और ऋण के कुछ भाग को अनुदान में बदलने का भी आग्रह किया। इस विषय में विकसित देशों ने कोई निश्चित नीति अपनाने से इन्कार कर दिया किन्तु अधिक अध्ययन और जाँच करने हेतु विषय को व्यापार एवं विकास मण्डल के सुपुर्द दिया।

(8) अन्य विषय- अन्य विषय जिन पर कोई सर्वमान्य समझौता नहीं हो सका, निम्नांकित थे-

(i) अधिमानों को सामान्य योजना का विस्तार करना एवं इसे अगले दशक के लिए और चालू रखना।

(ii) अन्तर्राष्ट्रीय जहाजरानी-सेवाओं में सुधार।

(iii) बहुराष्ट्रीय व बहुपक्षीय व्यापारिक वार्ताओं का मूल्यांकन।

(iv) तकनीकी ज्ञान के हस्तान्तरण से सम्बन्धित आचार संहिता।

(v) समाजवादी देशों द्वारा विकासशील देशों से अधिक व्यापार एवं उन्हें और अधिक सहायता देना।

(vi) अन्तर्राष्ट्रीय वायु यातायात में अपनाई जा रही विभेदात्मक नीतियों को दूर करना आदि।

अंकटाड-छठा (UNCTAD-VI)

अंकटाड का छठा सम्मेलन (UNCTADVI) 6 जून, 1983 को बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में हुआ। इसमें भाग लेने वाले 166 देशों के अनेक प्रतिनिधि थे। सम्मेलन 3 जुलाई तक चला। इस सम्मेलन में मुख्य रूप से निम्न मसलों पर विचार किया गया। ये विषय अप्रैल, 1983 मे ब्यूनर्स एअर्स में सर्वसम्मति से विचार-विमर्श के लिए एक मसौदे के रूप में निर्धारित किये गये।

(1) इससे पूर्व के अंकटाड सम्मेलनों में पहले से ही स्वीकार किये जा चुके प्रस्तावों को तत्काल लागू करने के उपाय किये जायें, इनमें मुख्य रूप से सामान्य कोष की स्थापना तथा वस्तु बाजारों की स्थिरता आदि उपाय सम्मिलित हैं।

(2) विकासशील देशों के निर्यातों को बढ़ाने के लिए संरक्षणवादी नीतियों के स्थान पर अन्य सार्थक उपाय किये जाने चाहिए।

(3) विकासशील देशों को अधिक वित्तीय साधन उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था की जाय तथा इसके लिये यदि आवश्यक हो तो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था में आवश्यक सुधार किये जायें।

(4) अल्प-विकसित देशों को और अधिक आर्थिक सहायता देने के लिए एक नवीन कार्यक्रम तैयार किया जाय। इसमें निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुए।

विकसित देशों से कहा गया कि वे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में संरक्षणवाद की नीति का अन्त करें तथा विकासशील देशों को अधिक सरकारी वित्तीय सहायता प्रदान करें। विश्व बैंक से विकासशील देशों को अधिक ऋण देने की अपेक्षा की गई।

धनी समाज से उसकी GNP में से अल्पविकसित देशों को दिये जाने वाले विकास सहायता के अंशदान को 1985 तक दुगुना करने के लिए आग्रह किया गया। सम्मेलन में अर्द्ध-विकसित देशों के मध्य सामूहिक स्वावलम्बन के लिए बल दिया गया। अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक तरलता को बढ़ाने तथा SDR के नये आवण्टन के प्रस्ताव भी किये गये। इस प्रकार सम्मेलन की कार्य सूची में अनेक मौद्रिक और वित्तीय विषय सम्मिलित थे। इस सम्मेलन में विकसित देशों ने कोई निश्चित वायदा नहीं किया। इससे निराशा रही तथा लम्बी वार्ता होने पर भी सम्मेलन में प्रगति के लक्षण दिखाई नहीं दिये।

अंकटाड-सातवाँ (UNCTAD-VII)

अंकटाड का सातवाँ सम्मेलन 3 अगस्त, 1987 को जेनेवा में समाप्त हुआ। इसमें विकासशील देशों की गम्भीर ऋण समस्या, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में संरक्षणवाद को रोकने तथा न्यून विकसित अर्थात् अर्द्ध-विकसित राष्ट्रों में आर्थिक और सामाजिक दशाओं को सुधारने के कई प्रस्ताव रखे गए।

अंकटाड का यह सम्मेलन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जायेगा कि इस सम्मेलन में पहली बार विकसित एवं विकासशील देशों ने सर्वसम्मति से कुछ ऐसे निर्णय लिये जो मुख्य रूप से विकासशील देशों के लिए अधिक लाभकारी थे। ये विषय निम्नलिखित थे-

(1) आर्थिक विकास हेतु आवश्यक संसाधन- सम्मेलन में उपस्थित समस्त प्रतिनिधियों का यह मानना था कि अधिकांश विकासशील देशों पर आन्तरिक एवं बाह्य ऋणों का भारी बोझ है। इस स्थिति में सुधार लाने के लिए सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि वाणिज्यिक बैंक ऋणों का पुनः सूचीकरण करें तथा नये ऋण अधिक उदार एवं लचीली शर्तों पर दिये जायें। यदि कोई सर्वाधिक निर्धन देश ऋण समायोजन के लिये उपयुक्त नीति अपना रहा है तो noउसे विशेष रूप से ब्याज की दर में रियायत तथा दीर्घावधि भुगतान की सुविधा प्रदान की जाय।

विकासशील देशों ने विकसित देशों से सर्वसम्मति से यह अनुरोध किया कि वे उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 0.7% विकासशील देशों को आर्थिक सहायता के रूप में उपलब्ध करायें।

(2) वस्तुएँ एवं साझा कोष- विकासशील देशों के लिए एक महत्त्वपूर्ण लाभ यह रहा कि वस्तु-मूल्य स्थायित्व के लिये वस्तुओं के समन्वित कार्यक्रम तथा सामान्य विधि (Common fund) के लागू होने पर समझौता हो गया। इसकी एक अन्य उपलब्धि निर्धन देशों द्वारा धनी देशों से संरक्षणवाद को कम करने के उपायों के सम्बन्ध में, आश्वासन मिलता रहा। इसके साथ ही यह तय हुआ कि वस्तुओं में व्यापार के लिए दी जाने वाली रियायतों को अन्य क्षेत्रों की रियायतों से नहीं जोड़ा जायेगा।

अंकटाड की सामान्य निधि (कोष) जो समन्वित वस्तु कार्यक्रम (ICP) के अन्तर्गत स्थापित हुई थीं बहुत से देशों द्वारा इसे स्वीकार किये जाने के पश्चात् चालू हो गई हैं। अंकटाड-7 के सम्मेलन में घोषित नये वायदों से इसकी कुल प्लैण्ड पूँजी (Pledged Capital) में 470 मिलियन डालर कोष के 66.9 प्रतिशत तक वृद्धि हुई।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, तृतीय विश्व ऋण, वस्तुएँ तथा न्यून विकसित राष्ट्रों को सहायता की चार प्रमुख कार्यसूची की मदों पर 150 देशों से अधिक के प्रतिनिधियों द्वारा किये गये बहुत से समझौते विगत मई माह के विकासशील देशों के ‘हवाना घोषणा’ से बहुत दूर रहे। फिर भी कई तृतीय विश्व के राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने अंकटाड-7 के निर्णयों पर सन्तोष व्यक्त किया। ऐसा विचार व्यक्त किया गया कि 4 वर्ष पूर्व हुये अंकटाड-6 की विफलता के पश्चात् इस सम्मेलन में व्यक्त मत और निर्णयों से UNCTAD को बल मिला है।

अंकटाड का आठवां सम्मेलन-कोलम्बिया (1992)

यह सम्मेलन 8 फरवरी से 25 फरवरी, 1992 के बीच कोलम्बिया में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में अल्पकालिक देशों की धीमी आर्थिक विकास की दर (केवल 2.7 प्रतिशत) पर चिन्ता व्यक्त की गई। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विकसित देशों द्वारा अपने कुल घरेलू उत्पाद का 0.7 प्रतिशत निर्धन देशों की सहायता करने पर व्यय करने का लक्ष्ये केवल नीदरलैण्ड, नार्वे, स्वीडन तथा डेनमार्क ने ही प्राप्त किया है और अन्य विकसित देश लक्ष्य पूरा इस कारण नहीं कर सके क्योंकि उन्होंने अल्पविकसित देशों के संबंध में बहुत कम रुचि रखी।

कोलम्बिया सम्मेलन में इस बात पर दुख प्रकट किया गया कि अधिकतर देशों ने पिछले दो सम्मेलनों के मुद्दे को पूर्ण रुचि के साथ नहीं लिया। आठवें सम्मेलन के अंकटाड के महासचिव कैनथ डेडजी ने यह मत व्यक्त किया कि संसार के 47 निर्धन देशों ने बहुत धीमी आर्थिक प्रगति की जो अंकटाड के प्रयासों पर एक धब्बा है।

भारत के वित्तमंत्री डा० मनमोहन सिंह ने अंकटाड के अष्टम सम्मेलन के दौरान यह मत व्यक्त किया कि अर्द्धविकसित देशों पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है तथा विकसित देशों से यह अनुरोध किया कि अर्द्धविकसित देशों का ध्यान आवश्यकता से कम है। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के नियमन एवं प्राविधान ऐसे होने चाहिए जो अर्द्धविकसित देशों के लिये सहायक हों। उन्होंने कहा कि विकसित देशों को अर्द्धविकसित देशों को भरपूर मात्रा में तकनीकी सहायता प्रदान करनी चाहिए। इस अष्टम अंकटाड सम्मेलन में इस बात पर भी बल दिया गया कि संरक्षणवादी प्रवृत्तियों को समाप्त करने पर बल दिया जाना चाहिए। सम्मेलन में सभी अविकसित देशों के सदस्यों ने इस बात पर भी बल दिया कि आधुनिकीकरण के इस युग में आधुनिक तकनीक बिना रोक-टोक एवं नियन्त्रण के इन देशों को उपलब्ध कराई जाये। अर्द्ध- विकसित देशों के बढ़ते ऋण भार पर चिन्ता व्यक्त करते हुए सम्मेलन के महासचिव कैनेथ डेडजी ने कहा कि बढ़ता हुआ ऋण-भार किसी भी हालत में अर्द्धविकसित देशों की स्थिति को नहीं सुधार सकता।

आठवें अंकटाड सम्मेलन में उदारीकरण प्रक्रिया पर बल देते हुए कहा कि सभी राष्ट्रों को बाजार के बहुपक्षीय उदारीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए।

अब तक हुए अंकटाड के आठों सम्मेलनों में समस्त सदस्य राष्ट्रों, विशेषकर अर्द्धविकसित राष्ट्रों के आर्थिक विकास के संबंध में काफी नियम पारित किये गये परन्तु एक दुःख की बात यह है कि विकसित देशों ने अर्द्ध-विकसित देशों के मामले में अधिक रुचि नहीं ली तथा उन्हें उचित सहायता प्रदान नहीं की जा सकी। सातवें तथा आठवें अंकटाड सम्मेलनों के बीच दो अंकटाड रिपोर्ट सन् 1989 तथा 1991 में प्रस्तुत हुई जिसमें प्रदर्शित किया गया अंकटाड के लगभग सभी बातों पर अमल किया तो गया परन्तु इसकी गति धीमी रही। भारत सहित सभी अर्द्धविकसित राष्ट्रों को अंकटाड से लाभ तो प्राप्त हुए परन्तु वांछित स्तर के परिणाम प्राप्त नहीं हुए अतः सभी अर्द्धविकसित देश मिलकर अंकटाड के प्रयासों के सफल बनाने का प्रयास करें।

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Pankaja Singh

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