इतिहास

अहाड़ ताम्र-पाषाणिक संस्कृति | बनास ताम्र-पाषाणिक संस्कृति | अहाड़ ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की विशेषताएं

अहाड़ ताम्र-पाषाणिक संस्कृति | बनास ताम्र-पाषाणिक संस्कृति | अहाड़ ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की विशेषताएं

अहाड़ (बनास) ताम्र-पाषाणिक संस्कृति

गुजरात और राजस्थान में जब सैंधव सभ्यता का अस्तित्व बना हुआ था तभी दक्षिण- पूर्व राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों में एक ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का उदय हुआ। भारतीय पुरातत्त्व इस संस्कृति को ‘अहाड संस्कृति’, के नाम से जानता है क्योंकि राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित अहाड (अक्षांश 249.40′ उ० देशान्तर; 73°50′ पू०) नामक पुरास्थल के सन् 1954-55 में रतनचन्द्र अग्रवाल द्वारा उत्खनन के फलस्वरूप सर्वप्रथम इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के विषय में जानकारी प्राप्त हुई। इस पुरास्थल पर अग्रवाल के नेतृत्व में अगले वर्ष भी उत्खनन हुआ। उस समय तक पुराविदों को भारत की ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के सम्बन्ध में जितनी जानकारी थी उसके आधार पर अहाड संस्कृति का सही आकलन नहीं हो सका। अग्रवाल के द्वारा इस पुरास्थल की खुदाई के पूर्व ही मध्य प्रदेश के माहेश्वर-नवदाटोली नामक पुरास्थल का उत्खनन हो चुका था, जहाँ के ताम्र-पाषाणिक स्तरों से भी कृष्ण-लोहित पात्र-खण्ड प्राप्त हो चुके थे। अग्रवाल ने इसी आधार पर ऐसी सम्भावना प्रकट किया कि अहाड़ संस्कृति के जनक मध्य प्रदेश की ओर से सम्भवतः दक्षिण-पूर्व राजस्थान पहुँचे थे लेकिन ‘दकन कालेज एण्ड पोस्ट ग्रेजुएट रिसर्च इंस्टीट्यूट’ पुणे, राजस्थान के ‘पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग’ तथा आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में इस पुरास्थल पर बाद में जो उत्खनन हुए, उनसे अग्रवाल का उपर्युक्त निष्कर्ष सही नहीं सिद्ध हुआ।

उदयपुर के पास स्थित अंहाड़ नामक पुरास्थल को स्थानीय लोग ‘धूलकोट’ के नाम से जानते हैं। परम्परा के अनुसार इस पुरास्थल का नाम ‘ताम्रवती’ है। इस संस्कृति के उत्खनित पुरास्थलों में अहाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के उदयपुर जिले में ही शहर से उत्तर-पूर्व की दिशा में लगभग 72 किमी की दूरी पर स्थित गिलुण्ड और मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित कायथा उल्लेखनीय है। राजस्थान के उदयपुर, चित्तौड़गढ़, अजमेर, जयपुर और मध्य प्रदेश के मन्दसोर तथा उज्जैन जिलों से अभी तक 50 से अधिक अहाड़ संस्कृति के पुरास्थल ज्ञात हो चुके हैं तथापि इस संस्कृति से सम्बन्धित बहुसंख्यक पुरास्थल दक्षिण-पूर्व राजस्थान में बनास और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में ही स्थित हैं इसलिए इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति को ‘बनास-संस्कृति’ के नाम से भी अभिहित किया जाता है।

अहाड़ संस्कृति का स्वरूप मुख्यतः अहाड़ तथा गिलुण्ड नामक पुरास्थलों से प्राप्त साक्ष्यों से ज्ञात होता है। राजस्थान के उदयपुर जिले में अहाड़ का 500 मीटर लम्बा और 275 मीटर चौड़ा तथा लगभग 12.50 मीटर वाला स्थित है। इस टीले के उत्खनन के फलस्वरूप ताम्र-पाषाणिक काल और प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल की इन दो संस्कृतियों से सम्बन्धित पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। अहाड़ के ताप्रपाषाणिक प्रथम काल के सम्पूर्ण निक्षेप को मृद्भाण्ड- परम्पराओं में हुए परिवर्तन के आधार पर अब ‘स’ तीन उपकालों में विभाजित किया गया है।

अहाड़ ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की विशेषताएं

आहड़ संस्कृति की विशेषताओं की निम्नवत् शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है-

  1. मृद्भाण्ड परम्पराएँ- अहाड़ की तान-पाषाणिक संस्कृति के लोग कई प्रकार की पात्र-परम्पराओं का प्रयोग करते थे। इन समस्त पात्र-परम्पराओं को सात वर्गों में विभाजित किया गया है। इनमें से श्वेत रंग से चित्रित कृष्ण-लोहित पात्र-परम्परा को अहाड़ संस्कृति की विशिष्ट मृद्भाण्ड परम्परा माना जाता है जिसके पात्रों में रेखीय और ज्यामितीय आकृतियों के अलंकरण-अभिप्राय अधिकतर सँजोये हुए मिलते हैं। प्रथम ‘अ’ उपकाल के स्तरों से दूधिया स्लिप वाली पात्र परम्परा के कुछ पात्र-खण्ड मिले हैं जो इस संस्कृति के प्रथम ‘ब’ उपकाल के स्तरों से नहीं प्राप्त हुए हैं। प्रथम ‘अ’ उपकाल की अन्य पात्र-परम्पराओं में पाण्डु, कृष्णलोहित चमकीली धूसर पात्र-परम्परा तथा लाल रंग की मृद्भाण्ड परम्परा आदि का उल्लेख किया जा सकता है। कृष्ण लोहित पात्र-परम्परा में कटोरे सबसे अधिक संख्या में मिलते हैं। धूसर पात्र-परम्परा के अन्तर्गत गोल आकार के घड़े, तसले, साधार तश्तरियाँ और ढक्कन प्रमुख पात्र-प्रकार हैं। लाल रंग की पात्र-परम्परा में घड़े, कटोरे, तश्तरियाँ और साधार तश्तरियाँ मिलती हैं। प्रथम ‘ब’ उपकाल (द्वितीय चरण) में दूधिया प्रलेप से युक्त और पाण्डु रंग की पात्र-परम्पराओं का प्रचलन समाप्त हो जाता है लेकिन अन्य पात्र-परम्पराएँ चलती रहती हैं। इस उपकाल की पात्र-परम्पराओं में प्रस्तर भाण्ड (Stone Ware) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साधार तश्तरियाँ, थालियाँ, गहरे एवं कोणाकार (Carinated) कटोरे, सादे, खराँचेदार और खोखले आधार वाले कटोरे तथा गोल आकार के बर्तन इस संस्कृति के द्वितीय चरण में मिलते हैं। अहाड़ संस्कृति के तृतीय चरण (प्रथम ‘स’ उपकाल) से जो पात्र- परम्पराएँ प्राप्त होती हैं उनमें लाल रंग की पात्र-पम्परा के अतिरिक्त चित्रित कृष्ण-लोहित पात्र-परम्परा, कृष्ण-लोहित रुक्ष लाल पात्र-परम्परा तथा लाल रंग की चमकीली मृद्भाण्ड परम्परा का उल्लेख किया जा सकता है। इस काल में प्रस्तर-पात्र विलुप्त हो गए। प्रमुख पात्र- प्रकारों में कोखदार या स्कन्धित कटोरे, उथले कटोरे (Rimless Bowls) साधार तश्तरियाँ प्रमुख प्रकार हैं। लाल रंग की पात्र-परम्परा के गाढ़े तथा हल्के लाल रंग के आधार पर कई उपविभाजन किये जा सकते हैं। कटोरे, छोटे आकार के गोल बर्तन (Globular Vessels) लोटे तथा एक विशिष्ट प्रकार की साधार तश्तरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। लाल रंग के चमकीले बर्तनों का मूल उत्स गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र की परवर्ती सैंधव पात्र-परम्परा में खोजा जा सकता है। प्रमुख अलंकरण-अभिप्रायों में लहरदार रेखाएँ, बिन्दु युक्त रेखाएँ, हीरक एवं यदा-कदा प्राप्य तारांकित अलंकरण आदि हैं। अलंकरण प्रायः बर्तनों के बाहरी हिस्से में गर्दन के आस-पास तक ही सीमित मिलते हैं। इन अलंकरणों के अलावा चिपकवाँ और उत्कीर्ण अलंकरण भी मिलते हैं।
  2. औजार, उपकरण तथा अन्य पुरानिधियाँ- अहाड़ संस्कृति के लोग ताँबे के उपकरण बनाने की कला से परिचत थे। सैंधव सभ्यता और ऊपरी गंगा घाटी की ताम्र-निधियों के बाद अहाड़ संस्कृति के स्तरों से ही सर्वाधिक ताम्र-उपकरण उपलब्ध हुए हैं। ताम्र-उपकरणों में चिपटी कुल्हाड़ियाँ (Flat Copper Celts) छुरियाँ, चाकू, चूड़ियाँ, छल्ले या मुद्रिकाएँ और छड़ें आदि उल्लेखनीय हैं। अहाड़ संस्कृति के लोग खेतड़ी (झुन्झुनू) की खानों से संभवतः ताँबा प्राप्त करते थे। इसके अलावा रतन चन्द्र अग्रवाल ने हाल ही में अहाड़ से लगभग 12 किमी की दूरी पर मतून (Matoon) तथा उमरा (Umra) नामक स्थानों पर ताँबे को गलाने के साक्ष्य खोज निकाले हैं। ताँबे के सहज-सुलभ होने के कारण अहाड़ लोगों को लघु पाषण उपकरणों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ी किन्तु इस संस्कृति के गिलुण्ड और कायथा नामक पुरास्थलों से लघु पाषाणिक उपकरण पर्याप्त मात्रा में मिले हैं। (Games-men) सैंधव परम्परा से अनुप्राणित प्रतीत होती हैं। एक गोट का ऊपरी सिरा मेढ़े का है। तुर्कु-चक्रों (Spindle-whorls) में उत्कीर्ण कर के अलंकरण बनाये गए हैं।
  3. मकान- अहाड़ संस्कृति के लोग अपने भवनों के निर्माण में पत्थर और मिट्टी का प्रयोग करते थे। प्रस्तर-खण्डों का प्रयोग केवल नींव के लिए ही किया जाता था। अहाड़ तथा कायथा नामक पुरास्थलों के मकानों की दीवालें संभवतः मिट्टी अथवा कच्ची ईंटों की बनाई जाती थीं। काली मिट्टी में पीली गाद मिट्टी का मिश्रण करके फर्श का निर्माण किया जाता था। अहाड़ में भवन-निर्माण के पन्द्रह उपकालों के साक्ष्य मिले हैं। यद्यपि उत्खनन से भवनों का पूरा आकार नहीं ज्ञात हुआ है तथापि जो साक्ष्य मिले हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि कम से कम कुछ मकान काफी बड़े होते थे। गिलुण्ड से 9 मीटर लम्बे और 4.50 मीटर चौड़े एक कमरे के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई है तथा 10.80 मीटर लम्बी एक दीवाल प्रकाश में आई हैं। अहाड़ में मकानों के अन्दर चूल्हों के अस्तित्व की भी सूचना मिलती है। कुछ चूल्हे तो काफी बड़े हैं। एक मकान में एक ही कतार में छः चूल्हे मिले हैं। कुछ मकानों में खाद्य पदार्थ पीसने के काम आने वाली सिलें भी प्रायः रसोईघर में चूल्हों के समीप ही प्राप्त हुई हैं। क्वााइट तथा बलुआ पत्थर से निर्मित इन सिलों पर शुरू में समतल लोढ़ों का प्रयोग किया जाता था लेकिन बाद में उन्नतोदर लोढ़े प्रयुक्त होने लगे थे। मकानों का छाजन या छप्पर बाँस-बल्लियों तथा घास-फूस का संभवतः बनाया जाता था। स्तम्भ-गर्तों के कतिपय साक्ष्यों से यह इंगित होता है कि कुछ मकानों की दीवाले बाँस-बल्ली की बनाई जाती थीं।

गिलुण्ड के उत्खनन से मकानों के निर्माण में पकी ईंटों के प्रयोग के साक्ष्य भी मिले हैं। गिलुण्ड में बड़ी इमारतों के अवशेष अधिक मिले हैं। पत्थरों की नींव पर भढे में पकाई गई 35 x 15 x 12.5 सेमी आकार की ईंटों से निर्मित एक इमारत प्रकाश में आई है। सैंधव सभ्यता के अतिरिक्त किसी ताम्र-पाषाणिक संस्कृति में भवनों के निर्माण में पकी ईंटों का प्रयोग सचमुच विशेष महत्त्वपूर्ण है।

  1. कृषि तथा पशु-पालन- अहाड़ के लोग खेतिहर तथा पशु-पालक थे। अहाड़ नामक पुरास्थल से प्राप्त पात्र-खण्डों में धान के कार्बनीकृत (अधजले) दानों, भूसी एवं पुआल की छापें (Impressions) मिलती हैं। इस प्रक अहाड़ के लोग धान की खेती निश्चित रूप से करते थे। जौ और गेहूँ की कृषि के प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिले हैं। परन्तु अनुमान किया जाता है कि ये लोग जौ तथा गेहूँ की खेती से भी संभवतः परिचित रहे होंगे क्योंकि अहाड़ की ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के पूर्व तथा पश्चात् की राजस्थान की संस्कृतियों में इन अनाजों की खेती के साक्ष्य मिलते हैं।

इस संस्कृति के विभिन्न स्तरों से मबेशी, भेड़-बकरी, सुअर, हिरण, कछुआ, मछली तथा बनमुर्गी आदि की हड्डियाँ मिली हैं। मवेशियों की हड्डियों की प्रधानता दिखलाई पड़ती हैं। इन पशुओं में से गाय बैल, भैंस, भेड़-बकरी एवं सुअर सम्भवतः इस काल के प्रमुख पालतू पशु थे।

  1. कालानुक्रम- अहाड़ की तान-पाषाणिक संस्कृति के तिथिक्रम के सम्बन्ध में अपेक्षाकृत हमें पर्याप्त जानकारी प्राप्त है। उपलब्ध साक्ष्यों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। प्रथम वर्ग में वे प्रमाण आते हैं जिन्हें पुरातात्त्विक साक्ष्य कह सकते हैं। दूसरी श्रेणी में कतिपय रेडियो कार्बन तिथियाँ आती हैं जो इस संस्कृति के लिए निरपेक्ष तिथियाँ प्रस्तावित करती हैं।
  2. पुरातात्विक स्तर-विन्यास- पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि अहाड़ संस्कृति मालवा संस्कृति से पहले की है क्योंकि अहाड़ संस्कृति में श्वेत रंग से चित्रित कृष्ण-लोहित पात्र-खण्ड अधिक संख्या में उपलब्ध होते हैं और चित्रण-अभिप्रायों में विविधता दृष्टिगोचर होती है। अहाड़ संस्कृति में इस तरह के पात्र-खण्ड इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के प्रथम चरण से लेकर अन्तिम चरण तक मिलते हैं। मालवा की ताम्र-पाषाणिक संस्कृति में श्वेत रंग से चित्रित कृष्ण-लोहित पात्र-खण्डों का प्रसार संस्कृति के निचले स्तरों तक ही सीमित दिखलाई पड़ता है। कायथा के उत्खनन से अब उपर्युक्त बात स्पष्ट हो गई है। कायथा के पुरास्थल पर जिन तीन ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों के पुरावशेष मिले हैं, उनमें श्वेत-चित्रित (White Painted) कृष्ण-लोहित पात्र-परम्परा, मालवा पात्र-परम्परा के पहले के स्तरों से प्रकाश में आई है। ऐसी स्थिति में कायथा संस्कृति के अन्त के लिए जो तिथि प्रस्तावित होगी, वह अहाड़ संस्कृति की प्राचीनतम सीमा रेखा होगी। अहाड़ संस्कृति निश्चय ही मालवा संस्कृति से पहले की है। इस निष्कर्ष की पुष्टि रेडियो कार्बन तिथियों से भी होती है।
  3. रेडियो कार्बन तिथियाँ- अहाड़ और कायथा नामक पुरास्थलों के इस संस्कृति से सम्बन्धित स्तरों से नौ-नौ रेडियो कार्बन तिथियाँ उपलब्ध हैं। रेडियो कार्बन तिथियों की एक व्याख्या के अनुसार अहाड़ संस्कृति की सीमा रेखा1700 ई०पू० से लेकर 1500 ई०पू० तक निर्धारित की जा सकती है। दूसरी व्याख्या के अनुसार अहाड़ संस्कृति के समग्र जीवन काल को 2000 ई०पू० से लेकर 1300 ई०पू० के बीच रखने का आग्रह किया गया है।

अहाड़ संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं में चाक पर बने सुन्दर मृद्भाण्ड, लघु पाषाण उपकरणों का अभाव, धातु-शोधन का ज्ञान, अच्छे तथा सुदृढ़ आधार वाले भवनों के निर्माण इत्यादि की गणना की जा सकती है। एच०डी०सांकलिया ने इन्हीं कारणों से अहाड़ (बनास) संस्कृति को ताम्र पाषाणिक न कहकर केवल ताम्र-संस्कृति की संज्ञा प्रदान की है। अहाड़ संस्कृति भारत की अन्य ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों से कुछ भिन्न है।

  1. अहाड़ संस्कृति का उद्भव- अहाड़ संस्कृति के उद्भव पर विचार करते समय इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस संस्कृति के अधिकांश पुरास्थल एक क्षेत्र विशेष में ही किफायती होते हैं। इसका विस्तार दक्षीणी-पूर्वी राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश में ही मिलता है। इस आधार पर यह सम्भावना प्रकट की जा सकती है कि यह एक क्षेत्रीय संस्कृति रही होगी। अहाड़ संस्कृति के उद्भव की समीक्षा करते समय कुछ अन्य बातों पर ध्यान देना होगा। इस संस्कृति के लोग उपर्युक्त क्षेत्र में चाहे जहाँ कहीं से भी आये हों, वे अपने साथ एक विशिष्ट पात्र-परम्परा ताँबे के उपकरण बनाने का तकनीकी ज्ञान और एक खास किस्म की भवन-निर्माण योजना लेकर आये थे।
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