इतिहास

असहयोग आन्दोलन | असहयोग आन्दोलन के कारण | असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य | असहयोग आन्दोलन की दुर्बलताएँ | असहयोग आन्दोलन का महत्व | असहयोग आन्दोलन की उपलब्धियाँ | गाँधी ने यह आन्दोलन शीघ्र वापस क्यों ले लिया

असहयोग आन्दोलन | असहयोग आन्दोलन के कारण | असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य | असहयोग आन्दोलन की दुर्बलताएँ | असहयोग आन्दोलन का महत्व | असहयोग आन्दोलन की उपलब्धियाँ | गाँधी ने यह आन्दोलन शीघ्र वापस क्यों ले लिया

असहयोग आन्दोलन (महात्मा गाँधी)-

सहयोग से असहयोग की ओर प्रारम्भ महात्मा गाँधी ब्रिटिश सरकार के समर्थक थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया। अतः युद्ध काल में ब्रिटिश सरकार को दिए गए सहयोग के कारण गांधीजी को ‘केसर- ए-हिन्द’ की उपाधि प्रदान की गई। परन्तु युद्ध के पश्चात् ब्रिटिश सरकार के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ और उसने भारतीयों के प्रति कठोर तथा दमनकारी नीति अपनाना शुरू कर दिया। अतः ब्रिटिश सरकार के विश्वासघातों तथा दमनकारी नीति से गाँधीजी को प्रबल  आघात पहुँचा। रौलट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड आदि घटनाओं ने गाँधी जी को असहयोगी बना दिया और 1920 में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आन्दोलन शुरू करने का निश्चय कर लिया जो ‘असहयोग आन्दोलन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

असहयोग आन्दोलन के कारण

असहयोग आन्दोलन के निम्नलिखित कारण थे-

(1) शोचनीय आर्थिक स्थिति- युद्धकाल में अत्यधिक धन खर्च करने के कारण भारत सरकार की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गई थी। वह कर्ज के बोझ से दब गई थी। मुद्रास्फीति के कारण वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हो गई। महंगाई के कारण जनसाधारण के लिये जीवन-निर्वाह करना अत्यन्त कठिन हो गया था। कई स्थानों पर महंगाई के विरुद्ध मजदूरों ने हड़ताले की तथा दंगे हुए। इस प्रकार किसानों और मजदूरों की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गई थीं। अतः आर्थिक कठिनाइयों के कारण भारतवासियों में तीव्र असन्तोष व्याप्त था।

(2) अकाल और प्लेग का प्रकोप- 1917 में अनावृष्टि के कारण देश में अकाल फैल गया। इसके साथ-साथ प्लेग और इन्फ्लूएंजा जैसी महामारी का भी प्रकोप हुआ। लाखों लोग, अकाल, प्लेग और इन्फ्लूएंजा के कारण मौत के मुँह में चले गए। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने महामारियों को रोकने के लिये और अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए प्रभावशाली कदम नहीं उठाये। फलस्वरूप भारतीय जनता में असन्तोष बढ़ता ही गया और अंग्रेजों के विरुद्ध जन भावना जोर पकड़ती गई।

(3) माण्टफोर्ड सुधारों से असन्तोष- प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् सरकार ने पाण्टफोर्ड सुधार लागू किये, परन्तु इन सुधारों से जनता को सन्तोष नहीं हुआ। ये सुधार भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सके। इस सुधार-योजना से प्रान्तों में उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं हुई तथा भारत सरकार पर गृह सरकार का नियन्त्रण पहले की भाँति ही बना रहा । इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन नहीं दिया। इस कारण भी भारतवासियों में तीव्र असन्तोष व्याप्त था। कांग्रेस ने इन सुधारों को ‘अपर्याप्त’ तथा ‘निराशाजनक’ बताया था। श्रीमती एनी बीसेन्ट ने भी इन सुधारों की आलोचना करते हुए कहा था कि “ऐसे सुधारों का देना जहाँ इंग्लैण्ड के अनुदार दृष्टिकोण का सूचक था, वहाँ इनको स्वीकार करना भारत के लिये भी अपमानजनक था।”

(4) रौलट एक्ट- ब्रिटिश सरकार ने मार्च, 1919 में भारत के राष्ट्रवादियों का दमन करने के लिए रौलट एक्ट पास किया। इस एक्ट के अनुसार किसी भी भारतीय को गिरफ्तार करके बिना मुकदमा चलाये जेल में बन्द किया जा सकता था और उसे अनिश्चित काल तक जेल में रखा जा सकता था। इसके अन्तर्गत दलील, अपील या वकील का अधिकार नहीं था। इस एक्ट के कारण भारतवासियों में तीव्र आक्रोश फैला हुआ था। गाँधीजी ने रौलट एक्ट की आलोचना करते हुए कहा कि “यह अन्यायपूर्ण है, स्वतन्त्रता व न्याय के सिद्धान्तों और व्यक्तियों के आधारभूत अधिकारों के लिए घातक और विनाशकारी है।”

महात्मा गाँधी ने रौलट एक्ट का घोर विरोध किया और इस एक्ट के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में हड़ताल करने की अपील की। अतः रौलट एक्ट के विरोध में 30 मार्च, 1919 को सम्पूर्ण देश में हड़ताल का निश्चय किया गया। परन्तु बाद में यह तिथि बदलकर 6 अप्रैल कर दी गई। गाँधीजी के आह्वान पर 6 अप्रैल, 1919 को सम्पूर्ण देश में हड़ताल रखी गई परन्तु दिल्ली में 30 मार्च, 1919 को हड़ताल की गई और वहाँ स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकाला गया। अंग्रेज सिपाहियों ने जुलूस में भाग लेने वाले लोगों पर गोलियाँ चलाई जिसके परिणामस्वरूप पाँच व्यक्ति मारे गए तथा अनेक व्यक्ति घायल हो गए। गाँधीजी के पंजाब तथा दिल्ली में प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, परन्तु गाँधीजी ने इसे स्वीकार नहीं किया। अतः 7 अप्रैल, 1919 को गाँधीजी को दिल्ली आते समय पलवल (हरियाणा) में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें वापस बम्बई भेज दिया गया !

(5) जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड- गाँधीजी के आह्वान पर रौलट एक्ट के विरोध में पंजाब में भी उग्र प्रदर्शन हुए। पंजाब में गवर्नर सर माइकेल ओ डायर ने अत्यन्त कठोर एवं दमनकारी शासन स्थापित कर रखा था। 10 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर ने बिना किसी कारण के डॉ० सत्यपाल तथा डॉ० सैरफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया तथा उन्हें धर्मशाला नगर में नजरबन्द कर दिया। इससे अमृतसर के नागरिक उत्तेजित हो उठे और उन्होंने एक जुलूस बनाकर अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर की कोठी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। यद्यपि जुलूस शान्त था, परन्तु रास्ते में अंग्रेज पुलिस ने जुलूस पर गोलियां चलाई जिससे दो व्यक्ति मारे गए तथा अनेक व्यक्ति घायल हो गए। इस पर जनता क्रुद्ध हो गई और उसने रास्ते में अनेक अंग्रेजों की हत्या कर दी और अनेक सार्वजनिक भवनों में आग लगा दी। श्रीमती शेरवुड नामक एक ईसाई महिला को घायल कर दिया गया तथा नेशनल एण्ड एलायड बैंक में आग लगा दी गई तथा यूरोपियन मैनेजर को मार डाला। इस पर अंग्रेजी सरकार बड़ी कुद्ध हुई तथा उसने अमृतसर नगर का प्रशासन सेना को सौंप दिया। 11 अप्रैल, 1919 को जनरल डायर ने अमृतसर नगर में स्थित सेना का भार सम्भाल लिया। 12 अप्रैल, 1919 को सारे शहर में दफा 144 लागू कर दी गई और जुलूसों तथा सभाओं पर पाबन्दी लगा दी गई परन्तु जनता को इसकी सूचना देने के लिये आवश्यक कदम नहीं उठाए गए।

13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में अंग्रेजों की दमनकारी नीति का विरोध करने के लिए एक सार्वजनिक सभा आयोजित की गई। इस सभा में लगभग 20 हजार व्यक्ति उपस्थित थे। जनरल डायर ने बिना चेतावनी दिए भीड़ पर गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया। जनरल डायर तथा उसके सैनिकों ने लगभग 10 मिनट तक1,650 गोलियां चलाई। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 व्यक्ति मारे गये तथा 1,200 व्यक्ति घायल हुए। परन्तु कांग्रेस की जाँच समिति की रिपोर्ट के अनुसार लगभग एक हजार व्यक्ति मारे गये।

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से समस्त देशवासियों में अंग्रेजों के प्रति घृणा फैल गई। सम्पूर्ण देश में जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की घोर निन्दा की गई। महात्मा गाँधी को भी इस हत्याकाण्ड से प्रबल आघात पहुँचा और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन शुरू करने का निश्चय कर लिया।

(6) अंग्रेजों की दमनकारी नीति- ब्रिटिश सरकार ने पंजाब के राष्ट्रवादियों को कठोरतापूर्वक कुचलना शुरू कर दिया। 15 अप्रैल, 1919 को पंजाब के पाँच नगरों-लाहौर, कसूर, गुजराँवाला, शेखपुरा और वजीराबाद में सैनिक शासन लागू कर दिया गया। अमृतसर के लोगों पर भारी अत्याचार किये गये। जिस गली में मिस शेरवुड पर आक्रमण हुआ था, उस गली में लोगों को पेट के बल रेंग कर जाने की आज्ञा दी गई। लोगों को खुले आम बेंत और कोड़े लगाए गए। हजारों देशभक्तों को जेलों में बन्द कर दिया गया। डॉ० पट्टाभि सीतारमैया का कथन है कि “लाहौर, गुजराँवाला तथा अन्य स्थानों पर अंग्रेज सैनिक एवं असैनिक अधिकारियों ने ऐसे अत्याचार किये कि वे खून को जमाने वाले हैं।” अंग्रेजों की दमनकारी नीति से गाँधीजी को प्रबल आघात पहुँचा।

(7) हंटर कमेटी की रिपोर्ट से निराशा- जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की सम्पूर्ण देश में घोर निन्दा की गई। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में अपनी ‘सर’ की उपाधि वापिस कर दी। सर शंकर नायर ने वायसराय की परिषद से त्याग-पत्र दे दिया। अन्त में भारी दबाव पड़ने पर अंग्रेजी सरकार ने हंटर की अध्यक्षता में एक जाँच-समिति नियुक्त की। हंटर कमेटी ने अंग्रेज अधिकारियों का ही पक्ष लिया। पंजाब के गवर्नर सर माइकल ओ डायर को निरपराध घोषित किया गया। उसे केवल पद से हटाने का दण्ड दिया गया। रिपोर्ट में जनरल डायर के कर्तव्य को ‘कर्तव्य से सत्यनिष्ठ’ परन्तु ‘गलत धारणा पर आधारित’ बताया गया। ब्रिटिश संसद में जनरल डायर की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की गई और उसे ‘ब्रिटिश साम्राज्य का शेर’ बताया गया। इंग्लैण्ड में उसके समर्थकों ने उसे एक तलवार तथा 20 हजार पौण्ड की थैली भेंट की। अंग्रेजों के इस व्यवहार से भारतवासियों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ। हंटर कमेटी की पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट से गाँधीजी को आघात पहुँचा और उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीति का विरोध करने का निश्चय कर लिया।

(8) खिलाफत आन्दोलन- प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने अंग्रेजो के विरुद्ध जर्मनी का साथ दिया था। युद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जार्ज ने भारतीय मुसलमानों को यह आश्वासन दिया था कि युद्ध की समाप्ति के बाद तुर्की साम्राज्य को विघटित नहीं किया जायेगा। परन्तु प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपने वचनों का पालन नहीं किया। तुर्की को सेने की सन्धि स्वीकार करने के लिये बाध्य किया गया जिसके अनुसार खलीफा का पद समाप्त कर दिया गया तथा तुर्की -साम्राज्य छिन्न-भिन्न कर दिया गया। तुर्की साम्राज्य को अपने अनेक प्रदेशों से वंचित होना पड़ा। अंग्रेजों के इस विश्वासघात से भारतीय मुसलमानों को प्रबल आघात पहुँचा और उन्होंने भारत में खिलाफत आन्दोलन शुरू कर दिया।

इस खिलाफत आन्दोलन के तीन उद्देश्य थे-(1) तुर्की साम्राज्य के विघटन को रोकना, (2) तुर्की पर अपमानजनक शर्तों को थोपने से रोकना, (3) आध्यात्मिक संस्था के रूप में खिलाफत का अस्तित्व बनाये रखना। गाँधीजी ने खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया। गाँधीजी भारतीय मुसलमानों की माँगों को न्यायपूर्ण मानते थे और खिलाफत आन्दोलन को हर सम्भव सहायता देना अपना कर्तव्य मानते थे। 24 नवम्बर 1919 को गाँधीजी की अध्यक्षता में दिल्ली में एक खिलाफ्त सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने बड़ी संख्या में भाग लिया । गाँधीजी ने खिलाफत के प्रश्न को हिन्दू मुस्लिम एकता बढ़ाने का सुनहरा अवसर समझा। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के आधार पर अंग्रेजों के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन शुरू करने का निश्चय कर लिया।

असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य-

असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य मुख्यतः दो थे-

(1) शान्तिपूर्ण एवं अहिंसात्मक उपायों से स्वराज्य प्राप्त करना।

(2) ब्रिटिश भारत की जो भी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संस्थाएँ हैं, उन सबका बहिष्कार कर दिया जाए और इस प्रकार सरकार की मशीनरी को बिल्कुल ठप्प कर दिया जाए।

असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम-

असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम निम्न प्रकार से निश्चित किया गया-

(1) सरकारी उपाधियों तथा अवैतनिक पदों का बहिष्कार किया जाए।

(2) सरकारी दरबारों तथा उत्सवों और सरकार के सम्मान में आयोजित उत्सवों में भाग न लिया जाय।

(3) सरकारी तथा अर्द्ध सरकारी स्कूलो एवं कॉलेजों का बहिष्कार किया जाए।

(4) सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार किया जाए।

(5) 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत होने वाले चुनावों का बहिष्कार किया जाए।

(6) सैनिक, क्लर्क तथा मजदूर विदेशों में नौकरी करने के लिये न जाएँ।

(7) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाए तथा स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग किया जाए।

(8) स्थानीय संस्थाओं के मनोनीत सदस्य अपने पदों से त्यागपत्र दे दें।

इसके अतिरिक्त कार्यक्रम का सकारात्मक पक्ष जिसमें निम्न बातें मुख्य थीं-

(1) राष्ट्रीय स्कूलों तथा कॉलेजों की स्थापना।

(2) आपसी विवादों को सुलझाने के लिए जनता की पंचायतों की स्थापना।

(3) स्वदेशी का व्यापक प्रचार ।

(4) हथकरघा तथा बुनाई उद्योग का पुनरुद्धार ।

(5) हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देना।

(6) छुआछूत का उन्मूलन ।

असहयोग आन्दोलन की प्रगति-

शीघ्र ही सम्पूर्ण देश में असहयोग आन्दोलन शुरू हो गया। गाँधीजी के आह्वान पर हजारों देशभक्त आन्दोलन में कूद पड़े। हजारों विद्यार्थियों द्वारा स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार किया गया। भारत में अनेक राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई जिनमें काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद, बिहार विद्यापीठ, पटना, मुस्लिम विद्यापीठ, अलीगढ़, नेशनल कॉलेज, लाहौर, जामियामिलिया, दिल्ली इत्यादि प्रमुख संस्थायें थीं। हजारों ने वकालत छोड़ कर आन्दोलन में भाग लेना शुरू किया। देशबन्धु चितरंजनदास, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, लाला लाजपतराय, सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, आसफ अली आदि ने अपनी-अपनी वकालत छोड़कर आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया।

विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। स्थान-स्थान पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। शराब तथा विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना दिया गया। हाथकरघा एवं बुनाई उद्योग को प्रोत्साहन दिया गया। चरखा कातना राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया और चरखा राष्ट्रीय चिह्न बन गया। डॉ० अन्सारी, मौलाना अब्दुल कलाम, आजाद, सौकत अली, मुहम्मद अली आदि राष्ट्रीय मुसलमान नेताओं ने भी आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया। इस प्रकार असहयोग आन्दोलन में हजारों मुसलमानों तथा हिन्दुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। पं० जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि “सर्वत्र हिन्दू-मुस्लिम की जय का बोलबाला था।’ विधान मण्डलों का भी बहिष्कार किया गया।

सरकार की दमनकारी नीति- असहयोग आन्दोलन की बढ़ती हुई लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार बौखला उठी और उसने आन्दोलन को कुचलने के लिये दमनकारी नीति अपनाई। शौकत अली, मुहम्मद अली, पं० मोतीलाल नेहरू, पं० जवाहर लाल नेहरू, लाला लाजपतराय, चितरंजनदास बन्धु, सुभाष चन्द्र बोस आदि प्रमुख नेता भी बन्दी बना लिए गए। 4 मार्च, 1921 को ननकाना में सिक्खों पर पुलिस ने गोलियाँ चलाई जिसके परिणामस्वरूप 70 व्यक्ति मारे गए।

17 नवम्बर, 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के बम्बई पहुंचने पर हड़ताल की गई। हजारों देशभक्तों को जेलों में बन्द कर दिया गया। 1921 ई० के अन्त तक लगभग 60 हजार व्यक्तियों को जेलों में बन्द कर दिया गया था। पंजवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि “लोग अपने यौवन को जेलों में बिता रहे थे।” परन्तु सरकारकी दमनात्मक नीति भी जनता को निरुत्साहित नहीं कर सकी। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का कथन है कि “जब से भारत का ब्रिटेन के  साथ सम्बन्ध स्थापित हुआ था, इसके इतिहास में जनता का क्षोभ तथा उत्साह इस सीमा तक पहले कभी नहीं पहुंचा था। इस दीर्गकाल में देश को अपने इतने अधिक सुपुत्रों की स्नेहपूर्ण अडिग सेवा पहले कभी प्राप्त नहीं हुई थी। पं० जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि “किशोर और नवयुवक पुलिस की गाड़ियों में जा बैठते और उतरने से इन्कार कर देते । पुलिस और जेल अधिकारी इन असाधारण घटनाओं से चकित और किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे।”

गाँधीजी की चेतावनी- 1 फरवरी, 1922 को महात्मा गाँधी ने वायसराय लार्ड रीडिंग को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होने वायसराय को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि एक सप्ताह के अन्दर दमनात्मक नीति बन्द नहीं कि गई तो वे सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर देंगे। परन्तु दुर्भाग्य से एक सप्ताह होने से पूर्व ही चौरी-चौरा काण्ड हो गया जिसके फलस्वरूप असहयोग आन्दोलन को ही स्थगित करना पड़ा।

चौरी-चौरा काण्ड और असहयोग आन्दोलन को स्थगित करना- 5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा नामक गाँव (उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में) कांग्रेस की ओर से एक जुलूस निकाला गया। पुलिस ने जुलूस को रोकने का प्रयास किया जिससे सत्याग्रहियों तथा पुलिस में मुठभेड़ हो गई। पुलिस ने सत्याग्रहियों को तितर-बितर करने का प्रयास किया जिससे सत्याग्रही उत्तेजित हो उठे और उन्होंने एक थाने में आग लगा दी। इसके परिणामस्वरूप एक थानेदार तथा 21 सिपाहियों की मृत्यु हो गई। इस घटना से गाँधीजी को प्रबल आघात पहुँचा। उन्होंने 12 फरवरी,1922 को बारदौली में कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक बुलाई जिसमें असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने का निश्चय किया गया। इस प्रकार असहयोग आन्दोलन का अन्त हो गया।

गाँधीजी की गिरफ्तारी और कारावास- 4 मार्च, 1922 को अंग्रेजी सरकार ने गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष के कारावास का दण्ड दिया गया। परन्तु बीमारी के कारण 5 फरवरी,1924 को गाँधीजी को जेल से मुक्त कर दिया गया।

असहयोग आन्दोलन की वापसी का राष्ट्रीय आन्दोलन पर प्रभाव असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने से राष्ट्रीय आन्दोलन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े-

  1. स्वराज्य दल की स्थापना- फरवरी, 1922 में असहयोग आन्दोलन को गाँधीजी द्वारा अचानक स्थगित कर देने से कांग्रेसी नेताओं में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हो गया। लाला लाजपतराय, पण्डित मोतीलाल नेहरू आदि ने गाँधीजी के आन्दोलन स्थगित करने की कटु आलोचना की और 1 फरवरी, 1923 को देशबन्धु चितरंजनदास के नेतृत्व में स्वराज्य दल की स्थापना की। इस प्रकार कांग्रेस में फूट पड़ गई।
  2. मुसलमानों का कांग्रेस से अलगाव- गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने का मुसलमानों पर विपरीत प्रभाव पड़ा। श्री पोलक के अनुसार, “इसके बाद वे (मुसलमान) कांग्रेस से खिंचते चले गये तथा एक बार फिर उस विश्वास तथा बन्धुत्व की प्रतिष्ठा करना असम्भव हो गया, जो अल्पकाल में इन दोनों जातियों के बीच देखी गई थीं।”
  3. गांधीजी की लोकप्रियता में कमी- असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने के कारण गाँधीजी की लोकप्रियता में अत्यधिक कमी हुई। गाँधीजी को जगह-जगह विरोध का सामना करना पड़ा। सरकार ने इसे सुनहरा अवसर समझा और मार्च, 1922 ई० में महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया।

इस प्रकार असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने से कुछ समय तक देश में निराशा का वातावरण छा गया।

असहयोग आन्दोलन की दुर्बलताएँ

असहयोग आन्दोलन को वांछित सफलता नहीं मिली। इस आन्दोलन की प्रमुख दुर्बलताएँ निम्नलिखित थीं-

(1) विधान मण्डलों के बहिष्कार से कांग्रेस को लाभ न मिलना- 1920-21 में होने वाले विधान मण्डलों के चुनाव का बहिष्कार किया गया। कांग्रेसी सदस्यों ने चुनाव में भाग नहीं लिया परन्तु वफादार तथा नरम दल के लोगों ने चुनाव में भाग लिया और वे चुनाव जीत गए। इसके फलस्वरूप कांग्रेसी सदस्य विधान मण्डलों में नहीं जा सके। अतः विधान मण्डलों के बहिष्कार से कांग्रेस को कोई लाभ नहीं हुआ।

(2) खिलाफत के प्रश्न को राजनीति से सम्बन्धित करना- खिलाफत का प्रश्न मुसलमानों का धार्मिक प्रश्न था । परन्तु महात्मा गाँधी ने इस प्रश्न को भारतीय राजनीति से सम्बन्धित करके एक भारी भूल की। पोलक का कथन है कि “खिलाफत आन्दोलन की बुनियाद गलत थी।” 1923 में कमाल पाशा के नेतृत्व में टर्की एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बन गया था और टर्की में खलीफा का पद समाप्त कर दिया गया था। राष्ट्रीय आन्दोलन में धार्मिक प्रस को गौण माना जाता है क्योंकि इन प्रश्नों से राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति को हानि पहुँचती है।

(3) स्वराज्य का लक्ष्य प्राप्त न होना- असहयोग आन्दोलन अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल रहा। यह आन्दोलन न तो दमनकारी कानूनों को रद्द करवा सका और न ही भारतवासियों को स्वराज्य दिलवा सका। सुभाष चन्द्र बोस का कथन है कि “एक वर्ष में स्वराज्य प्राप्त करने का वचन न केवल अविवेकपूर्ण वरन् बालक-सदृश भी था।”

(4) अविवेकपूर्ण कार्य- महात्मा गाँधी ने अपने सहयोगियों से परामर्श किये बिना ही असहयोग आन्दोलन को अचानक स्थगित कर दिया। जब आन्दोलन सफलता के निकट पहुँच गया था और ब्रिटिश सरकार के हाथ-पाँव फूल रहे थे। उस समय आन्दोलन को अचानक स्थगित करना एक अविवेकपूर्ण कार्य था। यदि यह आन्दोलन कुछ समय तक और चलता रहता तो सरकार को कुछ समझौता करने के लिये विवश होना पड़ता।

(5) मुसलमानों में असन्तोष- आन्दोलन को अचानक स्थगित कर देने से मुसलमानों में भी असन्तोष उत्पन्न हुआ। हिन्दुओं और मुसलमानों में कटुता बढ़ गई तथा अनेक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। मोपलों के विद्रोह हुए जिन्होंने अनेक हिन्दुओं की हत्या कर दी। इस प्रकार इस आन्दोलन के स्थगित होने से हिन्दू-मुस्लिम एकता को ऐसा आघात पहुँचा कि ‘दोनों जातियाँ फिर एक-दूसरे का सहयोग न कर सकीं।

असहयोग आन्दोलन का महत्व और उपलब्धियाँ

(1) जन-आन्दोलन- असहयोग आन्दोलन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को व्यापक बनाया। असहयोग आन्दोलन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जन आन्दोलन का रूप प्रदान किया। यह पहला जन-आन्दोलन था और इसने भारतीय जनता को स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाया। जो राष्ट्रीय आन्दोलन केवल शिक्षित वर्ग तक ही सीमित था, अब वह जन-आन्दोलन बन गया। कूपलैण्ड का कथन है कि ‘गाँधीजी ने वह काम किया जो तिलक जी भी नहीं कर सके थे। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक क्रान्तिकारी आन्दोलन के रूप में परिवर्तित कर दिया। उन्होने राष्ट्रीय आन्दोलन को क्रान्तिकारी ही नहीं, जनप्रिय भी बना दिया।”

(2) राष्ट्रीयता का प्रसार- असहयोग आन्दोलन ने देशवासियों में राष्ट्रीयता का प्रचार किया। गाँधीजी की अपील पर देश के भिन्न-भिन्न भागों के लोग कांग्रेस के झण्डे के नीचे संगठित हो गए तथा अपनी मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने के लिये प्रयल करने लगे।

(3) साहस, निर्भीकता, त्याग और बलिदान की भावनाओं का संचार- असहयोग आन्दोलन ने देशवासियों में साहस, निर्भीकता, त्याग और बलिदान की भावनाओं का संचार किया। अब देशवासी स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये केवल याचनाओं और प्रार्थनाओं पर ही निर्भर रहने के लिये तैयार नहीं थे, बल्कि हर प्रकार का त्याग और बलिदान कर देने के लिये भी कटिबद्ध थे। अब जनता निर्भीक होगई तथा अब लोगों को जेल जाने से कोई डर नहीं लगता था। अब जेल जाना देशभक्ति का चित समझा जाने लगा। मातृभूमि को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने के लिये भारतवासी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो गए। पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन ने आता-निर्भरता तथा शक्ति संचित करने का पाठ पढ़ाया। असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम और गान्धीजी की असाधारण प्रतिभा ने देशवासियों को अपनी ओर आकर्षित किया और उनमें आशा का संचार किया।”

(4) स्वराज्य की माँग का प्रबल होना- असहयोग आन्दोलन के कारण देशवासियों में राजनैतिक अधिकारों के लिये जागरुकता उत्पन्न हुई तथा स्वराज्य की माँग प्रबल हुई। अब स्वराज्य का सन्देश घर-घर पहुँचने लगा तथा बच्चे-बच्चे के मुँह से स्वराज्य का शब्द सुनाई देने लगा।

(5) कांग्रेस की नीति में परिवर्तन- पहले कांग्रेस केवल संवैधानिक साधनों पर ही बल देती थी, परन्तु अब उसने राजनैतिक अधिकारों एवं स्वराज्य की प्राप्ति के लिये बहिष्कार, जन- आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन आदि का सहारा लेना शुरू कर दिया।

(6) भविष्य के जन-आन्दोलनों की नींव रखना- असहयोग आन्दोलन ने भविष्य के जन- आन्दोलनों की नींव रखी। कांग्रेस ने जो बाद में स्वतन्त्रता आन्दोलन चलाए और जिनके द्वारा देश की स्वतन्त्रता प्राप्त की, उस दिशा में यह बड़ा भारी कदम था। माइकेल ब्रेकर का कथन है कि “यद्यपि आन्दोलन स्थगित हो गया परन्तु लोग इसकी महानता की स्मृति को भूल न सके और कुछ ही समय के बाद इस स्मृति ने राष्ट्र को एक और व्यापक तथा गम्भीर आन्दोलन चलाने की प्रेरणा दी।”

(7) स्वदेशी का प्रचार- असहयोग आन्दोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया तथा स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर बल दिया गया। इससे स्वदेशी का प्रचार हुआ तथा हजारों बेरोजगार जुलाहों को काम मिला।

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Pankaja Singh

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