इतिहास

आद्य-हड़प्पा सभ्यता | बलूचिस्तान, सिन्ध, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उनके निकट के स्थानों में विकसित हड़प्पा-पूर्व की बस्तियाँ (सभ्यता) | बलूचिस्तान, हड़प्पा-पूर्व, आद्य-सिंधु या आद्य-हड़प्पा सभ्यता

आद्य-हड़प्पा सभ्यता | बलूचिस्तान, सिन्ध, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उनके निकट के स्थानों में विकसित हड़प्पा-पूर्व की बस्तियाँ (सभ्यता) | बलूचिस्तान, हड़प्पा-पूर्व, आद्य-सिंधु या आद्य-हड़प्पा सभ्यता

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आद्य-हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा की खोज 1922 ई० से आरम्भ हुई और उससे यह प्रमाणित किया गया कि आर्यों के आगमन से पूर्व ही भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में एक श्रेष्ठ सभ्यता का निर्माण हो चुका था । परन्तु उसके पश्चात् हुई अन्य खोजों ने एक अन्य बात प्रकट की कि हड़प्पा-सभ्यता की पृष्ठभूमि का निर्माण, सम्भवतया, उससे भी प्राचीन उन बस्तियों (ग्रामीण-सभ्यता) ने किया जिन्हें हम बलूचिस्तान, हड़प्पा-पूर्व, आद्य-सिन्धु या आद्य-हड़प्पा बस्तियों (सभ्यता) के नाम से पुकारते हैं। भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग बलूचिस्तान (आधुनिक पाकिस्तान में) में प्रायः 7000 ई०पू० कृषि पर आधारित इन बस्तियों का विकास आरम्भ हुआ। धीरे-धीरे इनका विस्तार-क्षेत्र बढ़ता गया और 3000 ई०पू० तक ये बस्तियाँ सिन्धु-घाटी, गोमल-घाटी, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और पूर्व में तत्कालीन सरस्वती (अतवा सुरसती) नदी की घाटी तक फैल गयीं। इन क्षेत्रों में विभिन्न स्थानों पर हुई खुदाई से कच्चे घर, पत्थर के कटोरे, पालतू जानवरों की हड्डियाँ, मिट्टी के बर्तन, पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, पकी हुई मिट्टी के खिलौने, कहीं-कहीं पकी ईंटों से बने हुए मकान, खाना बनाने के तन्दूर, आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं। बाद के समय में यहाँ के निवासियों ने ताँबे का प्रयोग आरम्भ कर दिया था। वे कृषि के लिए हल का प्रयोग भी करते थे, यह प्रमाणित हो गया है। इस प्रकार, इन बस्तियों की उपस्थिति में यह स्वीकार कर लिया गया है कि हड़प्पा सभ्यता से पूर्व ही भारत में कृषि का स्वरूप व्यावसायिक बन गया था जो गाँव अथवा नगर-जीवन के आरम्भ होने का आधार होता है। यह विचार भी प्रकट किया गया है कि, सम्भवतया, इन्हीं ग्रामीण-बस्तियों (इनकी सभ्यता) ने हड़प्पा की विकसित नगर-सभ्यता की पृष्ठभूमि का निर्माण किया यद्यपि इन बस्तियों और हड़प्पा-सभ्यता के पारस्परिक सम्बन्धों के विषय में कोई निश्चित विचार प्रस्तुत नहीं किया गया है। परन्तु यदि यह स्वीकार कर लिया जाता है कि इन्हीं बस्तियों ने हड़प्पा सभ्यता की पृष्ठभूमि का निर्माण किया तो हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि भारत की सभ्यता अपने विकास के लिए किसी भी प्रकार किसी विदेशी सभ्यता पर आश्रित नहीं रही बल्कि उसका विकास क्रमशः भारत की भूमि पर ही हुआ।

इस हड़प्पा सभ्यता से पूर्व की बस्तियों के अवशेष अनेक स्थानों पर प्राप्त हो चुके हैं। इनमें से प्राचीनतम अवशेष 7000 ई०पू० के हैं तथा इनमें से अनेक स्थानों पर प्रायः 4000 ई०पू० विकासशील ग्राम-अर्थव्यवस्था स्थापित हो गयी थी।

इन बस्तियों में सबसे प्राचीन बस्ती बलूचिस्तान में ‘मेहरगढ़’ में थी जिसके अवशेष प्रायः 7000 ई०पू० के माने गये हैं। ‘मेहरगढ़’ के अतिरिक्त इन बस्तियों के अवशेष बलूचिस्तान में ‘किली गुल-मनुहम्मद’, ‘दंब-सादात’, ‘अंजीरा’, ‘स्याह-दंब’, ‘राना- धुंदाई’, ‘कुल्ली’, ‘नाल’ और ‘बालाकोट’ में प्राप्त हुए हैं। ‘मेहरगढ़’ के आरम्भ के काल में मिट्टी से बने हुए बर्तन नहीं थे यद्यपि उस समय में बने हुए कच्चे घर, पत्थर के कटोरे और पालतू जानवरों की हड्डियाँ तथा कुछ अन्य वस्तुओं के अवशेष अवश्य प्राप्त हुए हैं। परन्तु यहाँ बाद में मिट्टी के बर्तन बनने आरम्भ हो गये, ताँबे का ज्ञान यहां के निवासियों को हो गया और अफगानिस्तान, ईरान तथा सम्भवतया, मध्य-भारत के निवासियों से उनका सम्पर्क हो गया था, ऐसा बाद के समय में प्राप्त अवशेषों से पता लगता है। इसी प्रकार, “किली गुल-मुहम्मद’ और ‘दंब-सादात’ स्थानों पर भी पहले के काल में मिट्टी से बनाये गये बर्तन नहीं थे यद्यपि बाद के समय में वहाँ पर भी मिट्टी के बर्तन बनाये गये थे, ताँबे का ज्ञान वहाँ के निवासियों को हो गया था, वे कच्चे घर बनाकर रहते थे, अफगानिस्तान और ईरान से उनका सम्पर्क हो गया था और प्रायः 4000 ई०पू० वहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित हो गयी थी। ‘अंजीरा’ और ‘स्याह-दंब’ की बस्तियों का निर्माण बाद के काल में हुआ जबकि वहाँ के निवासियों को मिट्टी के बर्तन बनाना आ गया था। इस प्रकार, ‘रानी-धुंदाई’ की बस्ती भी बाद के समय की है क्योंकि यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी भी की गयी थी, ऐसे अवशेष प्राप्त हुए हैं। ‘कुल्ली’, ‘नाल’ और ‘बालाकोट’ की बस्तियाँ भी बाद के काल की हैं। वहाँ पर प्राप्त अवशेषों से पता लगता है कि वहाँ के निवासी मिट्टी के बर्तन बनाते थे और उन पर चित्रकारी करते थे, उन्हें ताँबे का ज्ञान था तथा पश्चिम में फारस की खाड़ी तक वे व्यापार करते थे। परन्तु प्रत्येक स्थिति में यहाँ पाये गये अवशेष हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों से प्राचीन हैं।

गोमल-घाटी की खुदाई में प्राप्त हुए स्थानों में प्रमुख ‘गुमला’ और ‘रहमान ढेरी’ हैं। ‘गुमला’ में प्राप्त हुएं पहले के काल के अवशेषों में मिट्टी से लिपे-पुते गड्ढे, जानवरों की हड्डियाँ आदि ही प्राप्त हुए हैं परन्तु वहीं पर बाद के काल के अवशेषों में चित्रित मिट्टी के बर्तन, ताँबे का प्रयोग, मिट्टी से बनी विभिन्न आकृतियाँ और कच्चे मकानों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ‘रहमान ढेरी’ के अवशेषों से पता लगता है कि वहाँ दीवार से घिरी एक सुनियोजित बस्ती रही होगी।

पश्चिमी पंजाब में ‘सरायखोला’ और ‘जलीलपुर’ नामक स्थान खुदाई किये गये स्थानों में प्रमुख हैं। यहाँ पर भी प्रगति के दो काल रहे थे, यह प्रमाणित होता है। पहले के समय की ‘सरायखोला’ में प्राप्त वस्तुओं में पालिशदार कुल्हाड़ियाँ और मिट्टी के बर्तन प्रमुख हैं जबकि ‘जलीलपुर’ में प्राप्त वस्तुओं में मिट्टी के बर्तन, पत्थर के फलक तथा पकी मिट्टी के मनके प्रमुख हैं। बाद के काल की वस्तुओं में ‘सरायखोला’ में प्राप्त सुन्दर मिट्टी के बर्तन और जलीलपुर’ में प्राप्त मिट्टी के बर्तन तथा ताँबे के प्रयोग की उपस्थिति प्रमुख हैं।

सिन्ध में की गयी खुदाई में प्राप्त स्थलों में ‘अमरी’ और ‘कोटदीजी’ प्रमुख हैं। ‘अमरी’ में प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि वहाँ पर भी प्रगति के कई चरण रहे। वहाँ के पहले चरण में किसी प्रकार के भी मकानों की उपस्थिति प्राप्त नहीं होती यद्यपि मिट्टी के बर्तनों, पत्थर की गेंदों और ताँबे व काँसे के टुकड़ों के अवशेष अवश्य प्राप्त हुए हैं। इसके दूसरे चरण में मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी आरम्भ कर दी गयी थी और कच्ची ईंटों के मकान बनने आरम्भ हो गये थे। और इसके तीसरे चरण में मकान गारे और ईंटों के बनाये जाने लगे थे तथा मिट्टी के बर्तन चाक से बनाने आरम्भ कर दिये गये थे। ‘कोटदीजी’ में गारे और ईंटों का प्रयोग मकान बनाने और दीवारें बनाने के लिए किया गया था तथा चाक से मिट्टी के बर्तन बनाये जाते थे। परन्तु यहाँ के बर्तनों पर अधिकांशतया चित्रकारी नहीं की गयी थी। बर्तनों को केवल भूरे, काले या लाल रंग की पट्टियों अथवा लहरदार रेखाओं द्वारा ही अलंकृत किया गया था, जैसा कि हमें हड़प्पा सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों में भी प्राप्त होता है।

बहावलपुर, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में भी विभिन्न स्थानों पर खुदाई करने से हड़प्पा-पूर्व की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें सबसे प्रमुख स्थान राजस्थान में ‘कालीबंगा’ है। ‘कालीबंगा’ एक ऐसा स्थान है जहाँ हड़प्पा सभ्यता के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं। परन्तु उन अवशेषों से नीचे ऐसे भी अवशेष मिले हैं जिन्हें हड़प्पा-सभ्यता से पहले का माना गया है। अनुमानतया यह समय प्रायः 3000 ई०पू० का था। यहाँ की बस्ती की किलेबन्दी की गयी थी। बस्ती की सुरक्षा के लिए कच्ची ईंटों की दीवार बनायी गयी थी जो अपने बाद के चरण में 3-4 मीटर चौड़ी थी। सुरक्षा-दीवार की पश्चिमी भुजा 240 मीटर और पूर्वी भुजा 250 मीटर लम्बी थी।

किलेबन्दी के उत्तरी भाग में बस्ती का प्रवेश-द्वार था। यहाँ पर प्राप्त एक गली की चौड़ाई 1.5 मीटर थी। यहाँ के निवासियों ने अपने मकान अधिकांशतया कच्ची ईंटों के बनाये थे यद्यपि उन्हें पकी ईंटें बनाने का ज्ञान था, यह प्रमाणित होता है। मकानों में आँगन होते थे जहाँ खाना पकाने के तन्दूर थे। आँगन के किनारों पर कमरे बनाये जाते थे। खाद्यान्नों का संग्रह करने के लिये यहाँ के निवासी चूने से पुते गड्ढे बनाते थे। पकी मिट्टी से बने खिलौने, पहिये और जानवरों की हड्डियाँ भी यहाँ के अवशेषों में मिले हैं। यहाँ के निवासी हल का प्रयोग करते थे और बैलगाड़ियों का अस्तित्व भी यहाँ था, ऐसे प्रमाण प्राप्त होते हैं। वे पत्थर और ताँबा दोनों से बने उपकरणों का प्रयोग करते थे यद्यपि पत्थर के उपकरणों की संख्या अधिक थी। कम से कम छह प्रकार के चित्रित और गैर-चित्रित मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग किये जाने के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। हरियाणा और पंजाब में अन्य कई स्थलों पर खुदाई की जाने से भी हड़प्पा-पूर्व की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें एक प्रमुख स्थान हरियाणा के हिसार जिले में ‘बनवाली’ नामक स्थान है।

इस प्रकार, हड़प्पा-पूर्व ग्रामीण-सभ्यता भारत के उत्तर-पश्चिम में बहुत विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी। वस्तुतः पूर्व की ओर गंगा-यमुना-दोआब के क्षेत्र के अतिरिक्त हड़प्पा-सभ्यता का क्षेत्रीय विस्तार प्रायः वही रहा जो हड़प्पा-पूर्व की सभ्यता का था। इसी कारण, हमें ऐसे अनेक स्थान मिले हैं जहाँ हड़प्पा-पूर्व की सभ्यता विकसित थी और बाद में वहीं पर हड़प्पा- सभ्यता का भी विकास हुआ। अमरी, कालीबंगा और बनवाली ऐसे ही स्थानों में कुछ हैं। इसी कारण अनेक विद्वानों का यह कहन है कि इस हड़प्पा-पूर्व, बलूचिस्तान, आद्य-सिन्धु या आद्य-हड़प्पा कही जाने वाली ग्रामीण-सभ्यता ने हड़प्पा सभ्यता की पृष्ठभूमि का निर्माण किया यद्यपि इन दोनों सभ्याताओं के पारस्परिक सम्बन्ध थे या नहीं और यदि थे भी तो किस प्रकार के और किस सीमा तक, यह निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सका है।

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Pankaja Singh

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