इतिहास

आदर्शवाद की व्याख्या | आदर्शवादी विचारधारा का इतिहास में महत्त्व | आदर्शवादी इतिहास दर्शन

आदर्शवाद की व्याख्या

आदर्शवाद की व्याख्या | आदर्शवादी विचारधारा का इतिहास में महत्त्व | आदर्शवादी इतिहास दर्शन

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आदर्शवाद की व्याख्या

इतिहास की घटनाओं में एक युक्तिसंगत अर्थ देखने के जितने प्रयास हुए हैं, उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास हेगेल का है। हेगेल इतिहास-प्रवाह में परिवर्तनमात्र न देखकर एक क्रमिक विकास देखते हैं। जो लोग अब हेगेल से एकमत नहीं हैं, वे भी इससे प्रायः असहमत नहीं हैं कि इतिहास की घटनाओं में बढ़ने की, विकसित होने की प्रक्रिया सारभूत होती है। हेगेल के अनुसार यह विकास एक क्रम से होता है और वह क्रम द्वन्द्वात्मक है। विकास-क्रम की द्वन्द्वात्मकता उसके युक्तिसंगत होने का ही परिणाम है क्योंकि ज्ञान का विकास सहज रूप से एक द्वन्द्वात्मक क्रम का अनुसरण करता है। ज्ञान में अपने सत्य के प्रति एक जागरूकता निरन्तर बनी रहती है और वह पहले पक्ष को स्वीकारता है फिर उसे परखने के लिए उसके विपक्ष की ओर मुड़ता है और अन्ततः पक्ष और विपक्ष दोनों की एकांगिता को समझा उनके समन्वय की उद्भावना करता है। विशुद्ध विचार के क्षेत्र में सहज रूप से उपलब्ध होने वाली यह द्वन्द्वात्मकता मानवीय इतिहास के स्थूल स्तर पर भी एक अन्तर्नियामक के रूप में उपलब्ध होती है। राजनीतिक संघर्षों के पीछे राजनीतिक निष्ठाएँ होती हैं और उनके अनुयायियों का संघर्ष मानों निष्ठाओं के सूक्ष्म संघर्ष का स्थूल प्रतिबिम्ब होता है।

हेगेल अपने इतिहास-विचार को इतिहास-दर्शन कहता है। इतिहास-दर्शन इतिहास के ‘विवेकपूर्ण विचार’ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। विवेक मनुष्य का विशिष्ट स्वभाव है। उसके संवेदन और भाव, ज्ञान और संकल्प, सभी अपनी विशिष्ट मानवीयता में विवेकयुक्त होते हैं। तथापि इतिहास को विवेक से जोड़ना आपाततः असन्तोषजनक प्रतीत होता है क्योंकि इतिहास में तथ्यों की प्रधानता होती है और विचार उनके अधीन। दर्शन में इसका उलटा है क्योंकि वहाँ विचार अपने अस्तित्व निरपेक्ष स्वराज्य में विचरण करते हैं। अतएव इतिहास के दर्शन में सदा इसका भय रहेगा कि कहीं वह इतिहास के तथ्यों की प्राक्कल्पनाओं के अनुसार तोड़-मरोड़ न करें। किन्तु यह भय वस्तुतः निराधार है क्योंकि दर्शन इतिहास के पास एक ही पूर्व कल्पना लेकर आता है और वह है बुद्धि या विवेक की। वह यह मान कर चलता है कि “बुद्धि विश्व का शासन करती है, अतएव विश्व का इतिहास एक बुद्धिसंगत प्रक्रिया है।” दर्शन में यह विश्वास है, कि बुद्धि ही परम तत्त्व है और विश्व उसकी अभिव्यक्ति, एक तर्क-प्रतिपाद्य धारणा है। ऐतिहासिक ज्ञान के संदर्भ में यह दार्शनिक प्रतिपत्ति एक प्रकार की परिकल्पना बन जाती है जिसके सहारे इतिहास के तथ्य परखे जाते हैं। जो इतिहासकार अपने को कल्पनोपेक्षी और ‘निष्पक्ष’ कहते हैं और यह मानते हैं कि वे तथ्य मात्र का यथावत् प्रतिबिम्बन करते हैं, वे भी अपनी बुद्धि का सक्रिय प्रयोग करते ही हैं। वे भी अपने समक्ष प्रस्तुत प्रतिभासों को समझने के लिए अपने बुद्धिविकल्पों को प्रयुक्त करते हैं। सभी विद्याओं के अपने ‘पदार्थ’, अपनी मूल कल्पनाएँ होती हैं और यह असम्भव है कि बौद्धिक दृष्टि से बिना किसी विद्या का विकास हो सके। “बौद्धिक दृष्टि से विश्व को देखने से विश्व भी बुद्धिसंगत दीखता है।”

पूर्व के देशों में मानवीय आत्मा की सहज स्वतन्त्रता का बोध नहीं था। वे एक व्यक्ति को ही स्वतन्त्र मानते थे और इस धारणा से एकतन्त्र व्यवस्था में फंसे रहे। यूनानियों ने स्वतन्त्रता का पहले पहल परिचय पाया। किन्तु वे भी सिर्फ कुछ को स्वतन्त्र मानते थे। ईसाई धर्म से प्रभावित जर्मन जातियों ने सबसे पहले मनुष्य की स्वाभाविक स्वतन्त्रता का बोध पाया, पहले धर्म में और फिर जीवन के अन्य क्षेत्रों में। इतिहास को इस स्वतन्त्रता के बोध का इतिहास कहा जा सकता है। आध्यात्मिक विश्व की नियति, विश्व के परिवर्तनों का चरम साध्य और प्रयोजन, आत्मा का यह स्वतन्त्रता-बोध ही है।

संकल्प के प्रयोजन में जहाँ तक स्वार्थ और आदर्श का समन्वय होता है वहाँ तक वह स्वतन्त्र होता है। स्वतन्त्र संकल्प में चेतना अपने आप को ही संकल्पित करती है। वह अपने लक्ष्य को अपने स्वरूप के अनुकूल निर्धारित करती है। स्वतन्त्रता नियन्त्रण का अभाव नहीं है बल्कि आन्तरिक नियम की उपलब्धि है। राग-तत्त्व और बुद्धि-तत्त्व के सामंजस्य से ही यथार्थ स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। जिस समाज में व्यक्तियों की प्रवृत्तियाँ समाज के नियमों को आदर्श के रूप में स्वीकार करती हैं, वहाँ स्वतन्त्रता की यथार्थ में उपलब्धि होती है। कोरा नैतिक आदर्श अतिसामान्य होता है और यथार्थ लक्ष्यों को अपने अन्दर से खोज नहीं पाता। कोरा कानून एक बाध्यता मात्र होता है जो कि चेतना को बाध्य विवशता प्रतीत होती है। उसमें विशिष्ट विधि-निषेध दिये रहते हैं किन्तु उनमें व्याप्त न्यायबुद्धि का साक्षात्कार नहीं होता। कोरी नैतिकता या कोरी न्यायबुद्धि उतनी ही अपर्याप्त होती है जितनी कोरी कानून-व्यवस्था और उसके विधि निषेध। सहज सामाजिक संस्थाओं के रूप में ही नैतिकता और नियम में व्यक्त लक्ष्यों का समन्वय मिलता है। इसी से संस्थाओं के सदस्य के रूप में मनुष्य एक ऐसे नियम को प्राप्त करता है जिसे वह अपना समझता है। उसके रवार्थ यहाँ एक आदर्श के साथ मिलजुल कर चरितार्थ होते हैं। संस्थाओं का विकास मनुष्य की प्रवृत्तियों का आदर्शीकरण और उसके बुद्धिगत आदर्शों का यथार्थीकरण है। संस्थाओं के विकास का सर्वोच्च बिन्दु राज्य है। राज्य में स्वतन्त्रता एक व्यवस्था के रूप में व्यक्त हो जाती है और उसके अनुसरण से व्यक्ति अपने सर्वोच्च आदर्शों का अनुसरण करता है। राज्य को चरितार्थ-स्वातन्त्र्य अथवा नैतिक प्राणी कहा जा सकता है और राज्य ही इतिहास का मुख्य अधिष्ठान है। वह नैतिकता और कानून, समाज और संस्कृति सभी का उपजीव्य है।

हेगेल की यह मूलभूत मान्यता है कि यथार्थता और युक्तियुक्तता एक ही बात है। ज्ञान और वास्तविकता एक-दूसरे की ओर निरपेक्ष नहीं हैं। यह साधारण विश्वास कि वास्तविकता एक भौतिक प्रकृति के रूप में एक बाह्य सत्ता है और ज्ञान मन के अन्दर उसका एक अधूरा प्रतिबिम्ब है जिसकी उत्पत्ति और सत्य बाहरी वस्तु-जगत् के कार्य-कारण-व्यापार पर निर्भर करता है, प्रचलित होते हुए भी नासमझदारी और अज्ञान का परिणाम है। प्रकृति और सत्ता, अन्दर और बाहर का भेद, कार्य-कारणभाव—यह सब ज्ञान के बाहर के स्वतः सिद्ध पदार्थ नहीं हैं बल्कि ज्ञान की ही कल्पनाएँ हैं! ज्ञान में अप्रामाणिक और प्रामाणिक का भेद उसके अपने अन्दर के अधूरेपन और विसंगति के आधार पर तय होता है। वास्तविक और अवास्तविक का भेद प्रामाणिक और अप्रामाणिक ज्ञान के आधार पर होता है। इसलिए हेगेल का कहना है कि जब किसी विषय में बुद्धिगम्य संगति न प्रतीत हो तो हमें यह मानना चाहिए कि वह विषय अभी पूरी तरह सच्चा नहीं है और उसकी अकास्तविकता का बोध ज्ञान को वास्तविकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा है। सामान्य लोग जब अपने विचारों को यथार्थ के अनुरूप नहीं पाते तो विचारों दो दोषी ठहराते है। अपनी बुद्धि पर भरोसा न कर अपनी इन्द्रियों की सूचना पर भरोसा करते हैं। ऐसे लोग सदा ही यह मानते रहेंगे कि सूर्य और चन्द्रमा चलते-फिरते छोटे-छोटे गोले हैं। जैसे-जैसे मनुष्य के ज्ञान का विकास होता है वह प्रत्यक्ष-प्रतीतियों को बुद्धि के द्वारा सुधारता है। वह अप्रत्यक्ष बुद्धिगोचर नियमों से प्रत्यक्ष जगत् को समझता और बदलता है। मूल्य-ज्ञान के क्षेत्र में यह और भी स्पष्टता से देखा जा सकता है। हम अपने नैतिक विश्वासों के अनुसार सामाजिक यथार्थ को बदल देना चाहते हैं, अपने कलात्मक आदर्शों के अनुसार नई रचना करते हैं, अपने धार्मिक, विश्वासों के अनुसार जीवन का उत्सर्ग करने के लिए तैयार रहते हैं। जब यथार्थ और आदर्श में भेद प्रतीत होता है तो विवेकी पुरुष आदर्शों को न छोड़ कर यथार्थ को दोषी और एक गहरे अर्थ में अवास्तविक मानता है। उसकी प्रेरणा होती है उस अपारमार्थिक यथार्थ को आदर्श के अनुसार फिर से गढ़ने की।

हेगेल के इस बुद्धिवाद, विज्ञानवाद और यथार्थवाद में यह अन्तर निहित है कि सत्ता, ज्ञान और मूल्य तीनों एक ही आत्म-ज्ञान रूपी अखण्ड परमार्थ के अन्तर्गत विभेद हैं। सत्ता उसका विषय-पक्ष है, ज्ञान उसका विषयीपक्ष है और मूल्य उसके तादात्म्य की पहचान है। जिस समय विषयी विषय के रूप में अपने को पहचानता है, वही उसकी मूल्यबोध अथवा स्वतन्त्रताबोध की अवस्था है। सत्ता ज्ञान की विषयता है, मूल्य उसका आत्मपरिज्ञान। सभी खण्ड-ज्ञान अखण्ड और अनन्त आत्मज्ञान की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसीलिए सभी खण्ड-ज्ञानों में अपने अधूरेपन का एहसास अंकित रहता है और उसे उत्तीर्ण करने की प्रेरणा रहती है। यही आत्मज्ञान की प्रेरणा है अथवा ज्ञान की स्वात्मसम्पूर्णता की ओर प्रेरणा है। इसीलिए ज्ञान सदा आत्मनिषेध के द्वारा अपनी अखण्डता या सीमितता को दूर करना चाहता है। निषेध को हेगेल ने यथार्थ का हृदय कहा। ज्ञान के अन्दर यह निषेध की प्रक्रिया ही उसकी तार्किक द्वन्द्वात्मक है। शुद्ध विचार के प्रतियोगी के रूप में शुद्ध सत्ता का उदय इसी द्वन्द्वात्मकता का व्यापार है। इसी कारण प्रकृति की जड़ता आवश्यक रूप से चेतन मन की अपेक्षा करती है और सभी खण्ड सत्ताएँ नष्ट हो जाती हैं। मनुष्य की आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्ति के अन्दर अव्यक्त और अखण्ड आत्मज्ञान का अनिवार्य आकर्षण है। विश्व और उसका इतिहास आत्मज्ञान का ही विवर्त है।

हेगेल की इतिहास की व्याख्या स्पष्ट ही उसकी विश्व की दार्शनिक व्याख्या पर आधारित है। हेगेल की बुद्धिवादी, विज्ञानवादी, आदर्शवादी धारणाओं को स्वीकार करना एक विशेष दार्शनिक दृष्टिकोण को स्वीकार करना है। इतिहासकार के लिए यह कोई आवश्यक नहीं है कि वह किसी विशेष दर्शन का अनुसरण करे किन्तु क्या मानव जीवन या इतिहास की व्याख्या बिना किसी भी दर्शन को स्वीकार किए संभव है। साधारणतौर से इतिहासकार जिस लोकसिद्ध व्यवहारबुद्धि को अपनाते हैं वह अपने युगदर्शन अप्रभावित नहीं होते। मध्यकाल में प्रत्यक्ष का विश्वास धार्मिक श्रद्धा के अविरोधी रूप में स्वीकार किया जाता था। ईसा मसीह के अनुयायियों ने आँखों देखा हाल लिखने में चमत्कारों का वर्णन किया है। मध्यकालीन इतिहासकार इस साक्ष्य को सत्य के रूप में स्वीकार करते थे और उन्हें उनमें कोई दार्शनिक दुराग्रह नहीं दिखता था। आजकल का सामान्य प्रत्यक्षवादी विचारक भौतिक विज्ञान की दृष्टि का अनुसरण करता है और इस तरह के विवरण को प्रत्यक्षमूलक न मानकर श्रद्धामूलक मानता है। जो एक के लिए प्रत्यक्ष है वह दूसरे के लिए कल्पना है क्योंकि क्या सम्भव है क्या असम्भव, इस धारण में मौलिक भेद हुआ है। सामाजिक और राजनीतिक दृष्टियों के प्रति अधिकांश इतिहासकार कभी भी तटस्थ नहीं रहे हैं। व्यक्तिवादी, समाजवादी, साम्यवादी एवं अन्य मतावलंबी इतिहास की घटनाओं का चयन और अनुव्याख्यान विभिन्न रूप से करते हैं और इस भेद का मूल उनका दृष्टिभेद है। भले ही हम हेगेल के अत्यन्त साहसिक दार्शनिक अभियान के सहयात्री बनना चाहें किन्तु हमें यह स्मरण रखना होगा कि हम अपनी ऐतिहासिक व्याख्याओं में भी किसी न किसी दार्शनिक अभियान की छिटपुट और प्रचलित उपलब्धियों का सहारा लेकर ही आगे बढ़ पाते हैं।

स्वयं हेगेल का कहना है कि इतिहासकार के लिए इतना ही अभ्युपगम पर्याप्त है कि इतिहास की घटनाओं में बुद्धिगोचर सार्थकता है। जहाँ तक इतिहास एक विद्या है, इस प्रकार के अभ्युपगम को नकारा नहीं जा सकता। यह बात दूसरी है कि हम अपने ज्ञानभेद से सार्थकता को कैसे परिभाषित करते हैं। जो इतिहास को प्रकृति-राज्य के ही अन्तर्गत मानते हैं, वे उसमें कार्य- कारण-भाव को ही सार्थकता का पर्याप्त सूत्र समझते हैं। किन्तु, उन्हें यह मानना पड़ता है कि न तो अपने समूचेपन में इतिहास का कोई नियत विश्व है, न उसकी कोई अपनी विशिष्ट प्रक्रिया। किसी भी इतिहासकार के लिए यह स्वीकार करना कठिन होगा।

इतिहास को विचाराश्रित विकास मानने के साथ-साथ हेगेल का यह कहना था कि इस विकास का क्रम द्वन्द्वात्मक होता है। हेगेल के इतिहासदर्शन को द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद (Idealism) कहा जाता है। विचारों में जो आत्मबोध द्वारा प्रगति का क्रम है वैसा ही क्रम हेगेल इतिहास में देखना चाहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में भी संस्थाओं और विचारधाराओं की अपूर्णता और एकाग्रता उनके संघर्ष, अतिक्रमण और समन्वय का कारण बनती हैं और बहुधा परिस्थितियाँ विपरीत अवस्था में बदल जाती हैं तो भी इतिहास में द्वन्द्वात्मकता एक प्रकार की पारस्परिक सापेक्षता या “प्रतीत्यसमुत्पाद’ कहें तब तो वह ठीक लगता है किन्तु ऐतिहासिक द्वन्द्वात्मकता में नितान्त तर्कसारूप्य समझना एक भ्रान्ति है।

विचारों, आदर्शों, मूल्यों की द्वन्द्वात्मकता विचार के स्तर पर उनकी सम्भावनाओं की निरी आकारिक द्वन्द्वात्मकता होती है। इतिहास के स्तर पर बुद्धि सम्भावित आकारों को मूर्त रूप देकर परखा जाता है। इस तरह इतिहास में वैचारिक द्वन्द्वात्मकता द्विगुणित हो जाती है-एक ओर विचारों की आकारिक द्वन्द्वात्मकता, दूसरी ओर विचारों और उनके कार्यान्वयन एवं रूपान्वयन की। जहाँ विचारगत द्वन्द्वात्मकता तार्किक प्रसंग उत्पादित करती है और अभ्युपगमन, निषेध एवं ‘निषेध के निषेध’ के द्वारा प्रवृत्त होती है। इतिहासगत द्वन्द्वात्मकता में आदर्श की विभिन्न अभिव्यक्तियों के रूप-प्रभेद भी संगृहीत होते हैं। हेगेल ने इस द्विरूपता की ओर ध्यान नहीं दिया है और इसलिए ऐसा लगता है कि जब वे इतिहास में तर्कोचित द्वन्द्वात्मकता का प्रतिपादन करते हैं तो मानों वह अपने मूल अवधारणाओं को खींचतान कर तथ्यों पर बैठाते हैं। इस प्रकार के असन्तोष को क्रोचे ने अपनी पुस्तक हेगेल में क्या जीवित है, क्या मृत? में व्यक्त किया था। उनका कहना था कि हेगेल ने ‘विरुद्ध’ और ‘विभिन्न’ के अवधारणों के सार्थक भेद को नजरअन्दाज कर एक में मिला दिया है। विभिन्न रूपों के द्वारा आदर्श की ओर उपसर्पण वही नहीं है जो तर्क में विरुद्ध रूपों के द्वारा सत्य का निर्धारण।

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Pankaja Singh

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