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आदर्शवाद की विशेषतायें | भारतीय आदर्शवाद की विशेषतायें

आदर्शवाद की विशेषतायें | भारतीय आदर्शवाद की विशेषतायें | Characteristics of idealism in Hindi | Characteristics of Indian idealism in Hindi

आदर्शवाद की विशेषतायें

आदर्शवाद दर्शन में हमें नीचे लिखी विशेषताएँ मिलती हैं-

(i) विचार और आध्यात्मिक जगत की वास्तविकता, विचार से वस्तु जगत का निर्माण।

(ii) ‘विश्व सार्वभौमिक मन का बाहा प्रकाशन मात्र’- (फिचर)। भौतिक तत्व साररूप में आध्यात्मिक है– (लाइबेनीज)।

(iii) ईश्वर की सर्वोत्तम कृति मनुष्य (रॉस) मनुष्य परमात्मा की बनाई समस्त वस्तुओं का राजा-(साल्म) ।

(iv) जड़ वस्तु की अपेक्षा विचार अधिक महत्वपूर्ण, प्रधान और शाश्वत ।

(v) मनुष्य जीवन के तीन शाश्वत मूल्य-सत्यं शिवं, सुन्दरं, अपने आप में उपस्थित, अपने आप में पूर्ण अपने आप में वांछनीय

(vi) मनुष्य को आत्मानुभूति द्वारा सभी गुणों का उन्नयन, जीवन का परम लक्ष्य।

(vii) विभिन्न तत्वों को एक साथ रखने वाली एकता में विश्वास, एक तत्व सर्वोपरि, सर्वोच्च, परम शक्ति, असीम।

(viii) ईश्वरत्व, दैवत्व, परमपूर्णता, रहस्यमयता जैसी अलौकिक बातों में विश्वास।

(ix) मूल्य, सद्गुण, मान्यता, मानक, पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता, दण्ड, दैव- विपाक में विश्वास।

(x) बुद्धि, तर्क, विवेक, तितिक्षा, संयम, नियन्त्रण, नियम पालन, अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, इन्हें जीवन में धारण करना अत्यावश्यक समझना।

(xi) आत्मा, संकल्प की स्वतन्त्रता पर बल, मुक्ति, मोक्ष में दृढ़ विश्वास ।

(xii) धर्म में आस्था, धार्मिक क्रियाशीलता पर अत्यधिक बल, आध्यामिकता के लिये धर्म साधन होना।

(xiii) आध्यात्मिकता जीवन का सार-तत्व माना जाना।

(xiv) आदर्शों का पूर्व निमित्त, शाश्वत, सर्वव्यापी, अन्तिम बिन्दु होना मनुष्य द्वारा इनकी खोज और प्राप्ति।

(xv) मनुष्य अपने सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक धारकों से प्राकृतिक और सामाजिक वातावरण पर नियन्त्रण करने में समर्थ ।

प्रो० टॉमस तथा लैंग ने आदर्शवाद की विशेषताओं पर जो विचार दिये हैं उन्हें भी यहाँ देने से हमें इसके बारे में विस्तारपूर्वक ज्ञान होगा :-

(i) सच्ची वास्तविकता आध्यात्मिकता और विचार में होती है।

(ii) मनुष्य के लिये मानसिक जगत का ज्ञान आवश्यक है।

(iii) विचार और प्रयोजन की वास्तविकता ही सत्य है।

(iv) संसार का स्वरूप मस्तिष्क के द्वारा वास्तविक बनता है।

(v) ज्ञान का सर्वोत्कृष्ट और सर्वोच्च स्वरूप अन्तर्दृष्टि में पाया जाता है।

(vi) सच्चे जीवन का सारतत्व आत्मा का निर्णय होता है।

(vii) इन्द्रियों से सच्ची वास्तविकता का बोध नहीं किया जा सकता है।

(viii) भौतिक जगत में जो कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है, भ्रम है।

(ix) अन्तिम और असीम वास्तविकता अभौतिक ही होती है।

(x) हमारे चारों ओर का संसार हमारी आत्मा और मन का प्रकाशन मात्र है।

(xi) ईश्वर का सम्बन्ध मनुष्य के मन-मस्तिष्क से होता है जिससे वह अन्य प्राणिधारियों का ज्ञान कराता है।

(xii) मानव व्यक्तित्व उसके विचारों एवं प्रयोजनों का एक जटिल मिश्रण है। विचार एवं प्रयोजन वास्तविक हैं।

(xiii) मनुष्य का आत्मा अपने रूपान्तर के अतिरिक्त अन्य कुछ जानने में असमर्थ होता है।

(xiv) भौतिक जगत अपूर्ण होता है, अपूर्णता की अभिव्यक्ति यहाँ पाई जाती है।

(xv) निरपेक्ष मन का अपने आप अस्तित्व होता है, अन्य का अपने आप अस्तित्व नहीं होता है।

(xvi) विचार, ज्ञान, कला, नैतिकता और धर्म मानव जीवन के सबसे अधिक किमहत्वपूर्ण पहलू हैं।

(xvii) सत्य ज्ञान प्राप्त करने का साधन मनुष्य का और आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि है।

भारतीय आदर्शवाद की विशेषतायें

(i) परमसत्ता यद्यपि एक है फिर भी अनेक रूप में अभिव्यक्ति होता है। ब्रह्म, प्रकृति, पुरुष, माया, ये रूप परमसत्ता के ही रूप हैं।

(iii) ईश्वर, ब्रह्म, और उसकी शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति होती है।

(iii) ब्रह्म और जीवन में सर्वव्यापी चेतना पाई जाती है। आत्मा अमर है, ज्ञानमुक मुक्त है।

(iv) जीवन का परम लक्ष्य मुक्ति है जो ज्ञान भक्ति र कर्म से प्राप्त होती है।

(V) परम पुरुष प्रेम स्वरूप है- (टैगोर) । परमपुरुष से तादात्य करने का एक मात्र साधन प्रेम है। उसकी अनुभूति परमशान्ति देने वाली है। इसकी प्राप्ति से चरम मूल्यों की प्राप्ति होती है।

(vi) अन्तर्दृष्टि में आस्था से परमतत्व की प्राप्ति सम्भव है- (अरविन्द और राधाकृष्णन्) । अन्तर्दृष्टि ब्रह्म की खोज में लगाती है तथा सत्-चिद्-आनन्द की ओर ध्यान दिलाती है। यह साधना का मूल है।

(vii) धर्म में विश्वास भारतीय आदर्शवाद की एक विशेषता है। “धर्म समग्र यथार्थ सत्ता के प्रति समग्र मानव की प्रतिक्रिया है”- (राधाकृष्णन्) ।

(viii) मनुष्य और उसकी सत्ता में विश्वास होना एक अन्य विशेषता है। मानव शरीर में आत्मा या ब्रह्म का निवास होता है। मनुष्य ईश्वर सर्वोत्तम कृति है जो विचारवान है, मननशील है, व्यवहारशील है। इसीलिए भारतीय आदर्शबाद में विचारों की प्रधानता होती है।

(ix) मानव जीवन में नैतिकता, पवित्रता, आध्यात्मिकता, अनुशासनपूर्णता पर बल देना भी भारतीय आदर्शवाद की एक दूसरी विशेषता बताई गई है।

(x) ईश्वर और जगत दोनों सत्य हैं, शाश्वत हैं, विश्वसनीय हैं। ईश्वर से जगत, जीवन, प्रकृति सभी कुछ उत्पन्न है इसलिए ईश्वर के अनुरूप ही जगत होगा ऐसा विश्वास भारतीय आदर्शवाद में मिलता है।

प्रो० रॉस ने लिखा है कि आदर्शवाद दर्शन के बहुत से तथा भिन्न रूप होते हैं। (Idealistic philosophy takes many and varied forms) | बात सही है और जो रूप है वे नीचे दिये जा रहे हैं। इनको हम पाश्चात्य और भारतीय दृष्टि से समझाने का प्रयत्न करेंगे।

(अ) पाश्चात्य दृष्टि से-(i) सुकरात और प्लेटो का नैतिक आदर्शवाद जिसमें सत्यं शिवं सुन्दरं जैसे सद्गुणों पर अत्यधिक बल दिया गया है।

(ii) लाइबेनीज का चिबिन्दु का आदर्शवाद जिसमें सर्वोच्च चिद्-बिन्दु (Monard) ईश्वर है और अन्य चिद् बिन्दु संसार के समस्त प्राणी हैं। कुछ दार्शनिकों ने इसे अनेकवाद भी कहा है।

(iii) बर्कले का आत्मनिष्ठ आदर्शवाद जिसमें संसार आत्मा में निष्ठ है, उसका अस्तित्व आत्मा के कारण अपने-आप नहीं।

(iv) काण्ट का प्रपंचवादी आदर्शवाद जिसमे अनुभव, अन्तरात्मा, नैतिक मूल्य, कर्त्तव्य का जगत वास्तविक माना जाता है।

(v) हीगेल का निरपेक्ष आदर्शवाद जिसमें ईश्वर मनस् का चरम रूप है और पुद्गल (पदार्थ) से जगत का निर्माण करता है, ऐसा विश्वास मिलता है।

(vi) फेकनर का अवयवी आदर्शवाद ईश्वर को सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापक आत्मा कहा गया है और यह जगत उसकी तुर्कपूर्ण अवयवधारी रचना माना जाता है।

(vii) यूरेन का व्यक्तिंगत आदर्शवाद जिसमें प्रकृति जगत को परिवर्तनशील माना गया है। देवी संकल्प के कारण व्यक्तित्व का विकास होता है ऐसा विश्वास इसमें पाया जाता है।

(viii) जोन्स का गणितीय आदर्शवाद जिसमें मनुष्य के तर्क की वैज्ञानिकता पर बल दिया  जाता है। आइन्स्टीन के विचारों में भी हम इसी आदर्शवाद की छाप पाते हैं।

(ब) भारतीय दृष्टि से- (i) अद्वैतवादी आदर्शवाद जिसमें केवल एक ही तत्व ही सत्य, शाश्वत और सर्वस्रष्टा माना जाता है; इसे परमात्मा, परब्रह्म, ईश्वर जो कुछ भी कहें।

(ii) द्वैतवादी आदर्शवाद जिसमें ईश्वर और जीव दोनों तत्व सत्य एवं शाश्वत है।

(iii) बहुतलवादी आदर्शवाद जिसमें संसार के अनेक तत्वों को स्वतन्त्र सत्ता की गई। है और परमतत्व इन तत्वों के योग से सृष्टि की रचना करता है। यद्यपि अनेक तत्व होते है फिर भी सभी तत्वों में एकता और योग का पूर्ण सम्भावना पाई जाती है।

(iv) विशिष्ट द्वैतवादी आदर्शवादी जिसमें जीवन जड़ और ईश्वर तीन तत्व हैं और इनमें ईश्वर जीव और जड़ से विशिष्ट मूल तत्व हैं। जीव और जड़ दोनों उसके अंग हैं।

(v) द्वैताद्वैतवादी आदर्शवाद जिसमें जीव और प्रकृति परमात्मा से युक्त माने जाते हैं।

(vi) वैदिक आदर्शवाद जिसमें ईश्वर की परम सत्ता स्वीकार की जाती है और यही सर्वव्यापी होकर जगत का निर्माणकर्ता माना जाता है।

(vii) औपनिषिदिक आदर्शवाद जिसमें ईश्वर को सर्वव्यापी, सर्वद्रष्टा, सर्वशक्तिमान कहा जाता है और मनुष्य के लिए वह अनुकरणीय आदर्श होता है।

(viii) गीता का कर्मवादी आदर्शवाद जिसमें निष्काम कर्म में आस्था रखकर ईश्वर की शक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्त करना मनुष्य का कर्त्तव्य धर्म है।

(ix) योगवादी आदर्शवाद जिसमें मन, इन्द्रियों और शरीर पर नियन्त्रण करके ईश्वर की प्राप्ति पर बल दिया गया है। कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग से सम्बन्धित आदर्शवाद कहे जाते हैं। इसी प्रकार से हठयोग का आदर्शवाद भी है जिसमें शारीरिक नियन्त्रण एवं योगासन की क्रियाओं पर एकमात्र बल दिया जाता है।

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Pankaja Singh

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