अर्थशास्त्र

1990 की औद्योगिक नीति की आलोचनायें | भारत सरकार की नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति | 1991 एवं उदारीकरण | 1991 की नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति की विशेषताएँ

1990 की औद्योगिक नीति की आलोचनायें | भारत सरकार की नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति | 1991 एवं उदारीकरण | 1991 की नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति की विशेषताएँ

1990 की औद्योगिक नीति की आलोचनायें

(Criticisms of Industrial Policy-1990)

राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने 31 मई, 1990 को जो औद्योगिक नीति घोषित की, वह कई दृष्टि से अर्थव्यवस्था के विकास के अनुकूल थी, लेकिन फिर भी निम्नलिखित आधारों पर उसकी आलोचना की जाती है-

(1) असन्तुलित औद्योगिक विकास- इस औद्योगिक नीति में लघु एवं कृषि उद्योगों के विकास पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया जबकि दूसरे उद्योगों की उपेक्षा की गयी।

(2) शिक्षण एवं प्रशिक्षण पर ध्यान नहीं- इस औद्योगिक नीति में रोजगार के अवसरों में वृद्धि की बात कही गयी, लेकिन अधिकारियों एवं कर्मचारियों के शिक्षण एवं प्रशिक्षण का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया। ऐसी दशा में हम उनकी कार्यकुशलता और कुल उत्पादकता में वृद्धि लाने के लिए सोच भी नहीं सकते।

(3) केन्द्रीय निवेश अनुदान का जिक्र नहीं- इस नीति में ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में कम लागत पर अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाने के लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए एक केन्द्रीय निवेश अनुदान योजना की बात कही गयी, लेकिन अनुदान की राशि की सीमा का कहीं पर भी जिक्र नहीं किया गया, इससे स्थिति अन्धकारमय बन गयी।

(4) राजकोषीय रियायतों का खुलकर वर्णन नहीं- इस औद्योगिक नीति में लघु एवं कृषि उद्योगों को राजकोषीय रियायतें देने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन इन रियायतों एवं छुटों का वर्णन खुलकर नहीं किया गया। यदि इनका वर्णन खुलकर किया जाता, तो और भी नये उद्यमी औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश कर सकते थे।

(5) साख सुविधाओं में वृद्धि पर जोर नहीं- इस नीति में अनेक स्थानों पर यह कहा गया कि लघु एवं कृषि उद्योगों को साख सुविधायें उपलब्ध करवायी जाएगी और पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करने के प्रयत्न किये जाएगे। लेकिन नई वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की बात कहीं भी नहीं कही गयी।

(6) बड़ी निवेश सीमा बेनामी इकाइयों को जन्म- इस औद्योगिक नीति में लघु उद्योगों को निवेश सीमा में वृद्धि से आशानुकूल लाभ नहीं मिल सकता। इससे बेनामी स्वामित्व के स्थान पर बेनामी उद्योग को पनपने का मौका मिलने की सम्भावना थी।

(7) स्पष्ट दिशा-निर्देश का अभाव- इस औद्योगिक नीति के उद्देश्य तो बहुत आकर्षक थे, किन्तु क्या उत्पादन किया जाये और किनके लिए उत्पादन किया जाये? इसके सम्बन्ध में दिशा-निर्देश का अभाव था। सामाजिक प्राथमिकताओं के अनुसार उत्पादन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु विनियोग किस दिशा में किये जायें? न तो यह नीति आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन देने में स्पष्ट थी और न धनिकों के उत्कृष्ट उपभोग की वस्तु को हतोत्साहित करने में।

(8) नीति बहुत-कुछ राजनीति से प्रेरित- इस नीति में यद्यपि व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया था फिर भी यह सब कुछ राजनीति से प्रेरित था।

(9) उत्पादन वृद्धि एवं रोजगार बढ़ाने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम का अभाव- यह केवल राजनीतिक नारा बनकर रह गया। योजनाबद्ध विकास के पिछले अनुभव इसके साक्षी हैं कि उत्पादन एवं रोजगार में आशानुकूल वृद्धि नहीं हो पाई।

निष्कर्ष- इन आलोचनाओं के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि यह औद्योगिक नीति बड़ी सामयिक व व्यावहारिक थी।

भारत सरकार की नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति, 1991 एवं उदारीकरण

(Liberalisation and New Industrial and Licencing Policy-1991, of Government of India)

स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर 1990 तक भारत सरकार के द्वारा जितनी भी औद्योगिक एवं  लाइसेंसिंग नीतियाँ नीतियाँ घोषित की गयी हैं वे देश में एक स्वस्थ औद्योगिक वातावरण को बनाने में असमर्थ रही हैं। 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के द्वारा भी औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति घोषित की गयी, लेकिन इस नीति को भी देश में पूरी सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। इन समस्त नीतियों का प्रमुख उद्देश्य देश में समाजवादी समाज की स्थापना करना था, जिसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना पर बल दिया गया, लेकिन व्यवहार में ठीक इसके विपरीत हुआ और निजी क्षेत्र प्रबल होता गया, धन के संकेंद्रण को प्रोत्साहन मिला और आज सम्पूर्ण भारत में निजीकरण (Privatisation) की बात जोर पकड़ती जा रही है। इन सभी बातों से प्रेरित होकर 24 जुलाई, 1991 को उद्योग राज्यमन्त्री श्री पी0जी0 कुरियन ने संसद में नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति की घोषणा की। इस नीति में औद्योगीकरण को और भी सरल एवं सुलभ बनाया गया है इसीलिए इसे खुली एवं उदार नीति की संज्ञा दी है। इस नीति का प्रमुख उद्देश्य उद्योगों पर लगे लाइसेंस प्रतिबन्धों, नियन्त्रणों तथा तानाशाही जैसे वातावरण को समाप्त करना है जिससे देश में नया व्यावहारिक तथा उदार औद्योगिक वातावरण तैयार हो सके और स्वदेशी पूँजी के साथ-साथ विदेशी विनियोग को प्रोत्साहन मिल सके।

1991 की नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति की विशेषताएँ

(Characteristics of New 1991 Industrial & Licensing Policy)

24 जुलाई, 1991 को भारत सरकार के द्वारा जो नवीन औद्योगिक एवं लाइसेंसिंग नीति घोषित की गयी, उसकी प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं-

(1) लाइसेंसों से छुटकारा- इस नवीन औद्योगिक नीति में 18 बड़े उद्योगों को छोड़कर शेष सभी उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया है। अब 18 उद्योगों, जो सुरक्षा व यौद्धिक महत्त्व के हैं, के अलावा को अपनी स्थापना एवं विस्तार के लिए किसी भी प्रकार की सरकारी औपचारिकता पूरी करवाने की आवश्यकता नहीं है।

(2) प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग सीमा- भारत सरकार के द्वारा इस नवीन नीति में प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग सीमा 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 प्रतिशत कर दी गयी है। वर्तमान में सरकार इस सीमा को बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक करना चाहती है।

(3) विदेशी विशेषज्ञों की सेवाओं का उदारतापूर्वक आयात- इस नीति में यह व्यवस्था कर दी गयी है कि विदशों से विशेषज्ञों की तकनीकी सेवायें खुलकर आयात की जावेंगी, उनमें उदारता का रुख अपनाया जावेगा, जिससे देश में प्रौद्योगिकी को बढ़ावा मिलेगा।

(4) रुग्ण इकाइयों को औद्योगिक एवं पुनर्निर्माण निगम को सौंपना- इस नवीन औद्योगिक नीति के अनुसार बीमार औद्योगिक इकाइयों को पुनः जीवित करने के लिए औद्योगिक एवं पुनर्निर्माण निगम को सौंपा जावेगा और इससे विस्थापित श्रमिकों के हितो की रक्षा के लिए एक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जावेगा।

(5) एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार के अन्तर्गत कम्पनियाँ- जो कम्पनियाँ अथवा व्यावसायिक इकाइयाँ MRTP के अन्तर्गत आती हैं उनकी प्रारम्भिक सम्पत्ति सीमा समाप्त कर दी गयी है। ऐसा होने से इन कम्पनियों की स्थापना, विस्तार और विलीनीकरण जैसे प्रतिबन्ध स्वतः ही समाप्त हो जावेंगे तथा भारत सरकार से इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की स्वीकृति लेने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी।

(6) निजीकरण की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन- इस नीति में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में अपने विनियोग को कम करके जनता के विनियोग को बढ़ावा देगी। ऐसा करने से अर्थव्यवस्था में निजीकरण की भावना को प्रोत्साहन मिलेगा तथा सरकार अपना ध्यान दूसरे अल्पविकसित क्षेत्र की ओर लगावेगी।

(7) आठ उद्योगों को सरकारी क्षेत्र में- इस नीति में आठ बड़े व राष्ट्रीय हित के उद्योगों को कड़ाई के साथ सरकारी क्षेत्र में रखा गया है। इन उद्योगों में निजी हस्तक्षेप कतई पसन्द नहीं है- (i) रेल परिवहन, (ii) गोला बारूद व युद्ध सम्बन्धी सामान के उद्योग, (iii) कोयला व लिग्नाइट, (iv) खनिज तेल, (v) परमाणु शक्ति उद्योग, (vi) लोहा अयस्क, मैंगनीज अयस्क, क्रोम अयस्क, जिप्सम, गन्धक, स्वर्ण व हीरे सम्बन्धी उद्योग, (vii) ताम्बा, शीशा, जस्ता, टिन, मोलजिनम व घुलफ्रेम का खनन इत्यादि उद्योग, (viii) परमाणु शक्ति उत्पादन का नियन्त्रण एवं उद्योग आदेश 1953 की अनुसूची में विनिर्दिष्ट खनिज सम्बन्धी उद्योग।

(8) 18 उद्योगों के लिए अनिवार्य लाइसेंस प्रणाली- इस नवीन औद्योगिक नीति के अनुसार निम्नलिखित 18 उद्योगों को लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। लाइसेंस के बिना ये उद्योग अपना व्यवसाय नहीं कर सकते हैं-

  • (i) कोयला एवं लिग्नाइट
  • (ii) खतरनाक रसायन
  • (iii) औषधि एवं भैषज
  • (iv) चीनी उद्योग
  • (v) पशु चर्बी तथा तेल
  • (vi) पेट्रोलियम तथा इससे सम्बन्धित पदार्थ
  • (vii) मादक पेयों का आसवन और यचासवन
  • (viii) तम्बाकू के सिगार एवं सिगरेटें और विनिर्मित तम्बाकू प्रतिस्थापन
  • (ix) एस्बेस्टस और एस्बेस्टस पर आधारित उत्पादन
  • (x) अपरिष्कृत खालें, चमड़ा उद्योग इत्यादि।
  • (xi) रंगीन तथा प्रसाधित बाल वाली खालों सम्बन्धी उद्योग
  • (xii) मोटरकार, बस, ट्रक, जीप, पेन इत्यादि।
  • (xiii) समस्त इलेक्ट्रोनिक एवं रक्षा उपकरण
  • (xiv) खोई पर आधारित इकाइयों को छोड़कर सभी कागजी व अखबारी कागज।
  • (xv) प्लाईवुड, डैकोरेटिव विनियर्स और लकड़ी पर आधारित उद्योग।
  • (xvi) बिजली का मनोरंजन का सामान-वी0सी0आर0, कलर टी0वी0, सी0डी0 प्लेयर्स, टेपरिकार्डर इत्यादि।
  • (xvii) औद्योगिक विस्फोट सामग्री उद्योग।
  • (xviii) ह्वाइट गुड्स-डिश, वाशिंग मशीनें, एयर कन्डीशनर्स, घरेलू फ्रिज, माइक्रोवेव ओवन्स इत्यादि।

(9) श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा- इस औद्योगिक नीति में रुग्ण औद्योगिक इकाइयों की स्थिति में सुधार लाने के लिए श्रमिकों की सहभागिता व भागीदारी को प्रोत्साहन दिया गया है। इससे श्रम व प्रबन्ध के बीच मधुर सम्बन्ध बनेंगे व मिलों की कार्यकुशलता में  वृद्धि होगी।

(10) वर्तमान रजिस्ट्रेशन योजना समाप्त- इस नवीन नीति के अनुसार उद्योगों के लिए रजिस्ट्रेशन योजना समाप्त कर दी गयी है। अब 18 उद्योगों को छोड़कर शेष अन्य उद्योगों को रजिस्ट्रेशन करवाने, लाइसेंस लेने जैसी औपचारिकतायें पूरी करने की आवश्यकता नहीं है।

(11) एकाधिकार प्रतिबन्ध एवं अनुचित व्यवहार कानून को नियमन एवं नियंत्रण- इस नवीन औद्योगिक नीति में एकाधिकार प्रतिबन्ध एवं अनुचित व्यवहार कानून को नियमित एवं नियन्त्रित कर दिया गया है। इसके साथ ही आयोग को व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से उपभोक्ताओं की शिकायतों की जाँच का अधिकार दिया गया है। इसके लिए MRTP अधिनियम में आवश्यक संशोधन करने की बात कही गयी है जिससे आयोग अपने दण्डात्मक व पूरक अधिकारों का पूरा-पूरा उपयोग करने की स्थिति में हो।

(12) सावधि ऋणों के सम्बन्ध में- भारतीय वित्तीय संस्थाओं के द्वारा ऋणों को साधारण अंशपत्रों में बदलने या अनिवार्य परिवर्तनीयता धारा अब नवीन योजनाओं के सावधि ऋणों में लागू नहीं होगी।

(13) अधिक विस्तार सुविधायें- इस नवीन नीति में प्लान्ट एवं मशीनरी में अधिक विनियोजन की आवश्यकता नहीं होने पर विस्तार सम्बन्धी सुविधायें देने का प्रावधान रखा गया है, इसके साथ ही वर्तमान इकाइयों के विस्तार को भी लाइसेंस से मुक्त रखा जावेगा।

(14) उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों को विशेष सुविधा- इस नीति में उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों को एक करोड़ रुपये तक की लागत के लिए विदेशी तकनीकी समझौतों को स्वतः स्वीकृति प्राप्त होगी, लेकिन इसमें रॉयल्टी की अनिवार्यता रखी गयी है।

(15) विदेशी पूँजी निवेश पर छूट- इस नीति के अनुसार यदि स्वदेशी उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पूँजीगत माल आयात किया जाता है और उसमें विदेशी पूँजी निवेश सम्मिलित है तो उसे स्वीकृति प्राप्त हो जावेगी। इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर विदेशी मुद्रा नियन्त्रण में भी परिवर्तन कर दिया जायेगा।

(16) तकनीकी जाँच अनिवार्य नहीं- इस नवीन औद्योगिक नीति में यह व्यवस्था की गयी है कि किसी विदेशी तकनीशियन और स्वदेशी तकनीक की विदेशियों द्वारा जाँच करने की अनुमति नहीं दी जावेगी। रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के आधार पर तकनीकी सेवाओं का भुगतान किया जावेगा।

(17) समस्त लघु उद्योग लाइसेंस से मुक्त- इस नीति में भारत के समस्त लघु उद्योगों को लाइसेंस व्यवस्था से मुक्त कर दिया गया है, चाहे वे 18 अनिवार्य उद्योगों की श्रेणी में आते हों।

(18) प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी विनियोजन को प्रोत्साहन- इस नवीन नीति में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में औद्योगिक ट्रांसफर का लाभ उठाने की दृष्टि से प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी विनियोजन का अंश पूँजी के रूप में स्वागत किया गया है। इसके साथ ही इलेक्ट्रोनिक उपकरण, खाद्य प्रोसेसिंग, होटल उद्योग, पर्यटन उद्योग इत्यादि में विदेशी पूँजी विनियोजन का प्रतिशत 40 से बढ़ाकर 51 कर दिया गया है। इनके मार्ग में आने वाली बाधाओं को भी दूर किया जावेगा।

(19) विदेशी निवेश की सीमा- जिन उद्योगों के लिए विदेशी पूँजीगत माल अनिवार्य है और विदेशी मुद्रा का आसानी से प्रवन्ध हो सकता है या भविष्य में आर्थिक स्थिति सुधरने पर कुलपूजीगत उपकरणों का कुल मूल्य कर सहित 25 प्रतिशत अथवा 2 करोड़ रुपये, जो भी अधिकतम हो, स्वीकृति प्राप्त हो जावेगी। इसके अलावा अन्य मामलों में औद्योगिक विकास निगम से अनुमति लेनी होगी जो विदेशी मुद्रा की उपलब्धता पर निर्भर होगा।

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