शिक्षाशास्त्र

1917 के सैडलर आयोग | भारतीय शिक्षा के विकास पर सैडलर आयोग प्रभाव

1917 के सैडलर आयोग | भारतीय शिक्षा के विकास पर सैडलर आयोग प्रभाव

917 के सैडलर आयोग (कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग), 1917 [Sadler Commission (Calcutta University Commission), 1917]

भारत सरकार ने लार्ड हेल्डन के नेतृत्व में एक विश्वविद्यालय कमीशन नियुक्त करना चाहा पर सन् 1914 में प्रथम महायुद्ध प्रारम्भ हो जाने से और लार्ड हेल्डन की अस्वीकृति के कारण यह कार्य सम्भव न हो सका। इधर सन् 1916 में सर आशुतोष मुखर्जी के प्रयास से कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर विभाग की स्थापना पर सरकार ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की जाँच करके तथा शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं को रचनात्मक ढंग से सुलझाने के लिए 14 सितम्बर 1917 को एक आयोग की नियुक्ति की जो कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग कहलाता है। चूकि डॉ. माइकेल सैडलर उस समय लोड्स विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे जो कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोम के अध्यक्ष बनाये गये, इसी कारण यह कमीशन सैडलर-कमीशन’ के नाम से भी प्रसिद्ध है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग के अध्यक्ष इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध शिक्षा मर्मज्ञ और लार्ड विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. माइकिल थे तथा उन्हीं के नाम पर यह आयोग सैडलर आयोग भी कहलाता है। उनके अतिरिक्त इस कमीशन में निम्न सदस्य भी थे-डॉग्रेगरी, सर फिलीप हटांग, सर रैमजे म्योर, बंगाल के शिक्षा-संचालक सर आशुतोष मुखर्जी तथा डॉ. जियाउद्दीन अहमद ।

कमीशन द्वारा जाँच का विषय और अधिकार क्षेत्र- आयोग की जाँच का विषय था- “कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थिति एवं उसकी आवश्यकताओं की जाँच करना और उससे सम्बन्धित समस्याओं का समाधान करने के लिए रचनात्मक नीति पर विचार करना।”

वस्तुत: सैडलर कमीशन को कलकत्ता विश्वविद्यालय की व्याख्या कर उसकी आवश्यकताओं की जाँच करते हुए सम्बन्धित समस्याओं के लिए रचनात्मक अध्ययन की दृष्टि से अन्य विद्यालयों की जाँच करने का अधिकार दे दिया गया। इस प्रकार आयोग को ब्रिटिश भारत के सभी विश्वविद्यालयों की जाँच करनी थी और कलकत्ता विश्वविद्यालयों को केवल उदाहरण के रूप में सामने रखा गया था। कारण कि वह भारत का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय था। इसलिए आयोग ने अपने सामने व्यापक दृष्टिकोण से सुझाव दिये थे जो कि सभी भारतीय विश्वविद्यालयों पर लागू हो सकते थे।

आयोग के सुझाव और सिफारिशें (Suggestions and Recommendation of the Commission)

कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग ने माध्यमिक और उच्च शिक्षा के अतिरिक्त स्त्री शिक्षा, अध्यापकों के प्रशिक्षण, औद्योगिक एवं व्यावसायिक शिक्षा के सम्बन्ध में विचार करते हुए रचनात्मक सुझाव प्रस्तुत किये हैं। उनके इन सुझावों का क्रमवार उल्लेख निम्न प्रकार हैं-

(1) माध्यमिक शिक्षा- आयोग ने माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा को परस्पर सम्बन्धित मानते हुए माध्यमिक शिक्षा पर ही व्यापक ढंग से विचार किया है। क्योंकि वह माध्यमिक शिक्षा को आधार स्तम्भ मानता था और उसका विचार था कि जब तक माध्यमिक शिक्षा में क्रान्तिकारी सुधार न होंगे तब तक विश्वविद्यालय की शिक्षा में भी सुधार असम्भव ही है । उसकी दृष्टि में माध्यमिक शिक्षा में निम्नलिखित दोष थे-

(i) माध्यमिक विद्यालयों का शिक्षा स्तर सुयोग्य अध्यापकों के अभाव में गिरता जा रहा है और वेतन की कमी के कारण बहुत से लोग अध्यापन कार्य को पसन्द नहीं करते।

(ii) यद्यपि माध्यमिक शिक्षा का पर्याप्त विकास हुआ है पर उसमें गुणात्मक उन्नति नहीं हुई है।

(ii) कई ऐसे विषय हैं जो माध्यमिक विद्यालयों में महत्वपूर्ण व उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं पर उन्हें माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में स्थान न देकर इण्टरमीडिएट परीक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है।

(iv) माध्यमिक विद्यालयों में उचित शिक्षण सामग्री व उपयोगी साधनों का भी अभाव है।

(७) विद्यार्थियों की एक बहुत बड़ी संख्या धन की कमी के कारण ही माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने से भी वंचित रह जाती है।

(vi) परीक्षा पास करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य होने से माध्यमिक शिक्षा का दृष्टिकोण अत्यन्त एकांगी और सांस्कृतिक हो गया है क्योंकि उस पर सार्वजनिक परीक्षाओं का दूषित प्रभाव है।

सिफारिशें- उक्त त्रुटियों की ओर संकेत करते हुए आयोग द्वारा विचार व्यक्त किया गया कि उच्च शिक्षा की प्रगति की दृष्टि से माध्यमिक शिक्षा पुनर्संगठन आवश्यक है और इस सम्बन्ध में उसने निम्नांकित सिफारिशों को प्रस्तुत किया है-

(i) माध्यमिक शिक्षालयों के लिए पर्याप्त मात्रा में धनराशि निर्धारित कर दी जाये और यदि सरकार माध्यमिक शिक्षा में प्रगति करने की अभिलाषा रखती है तो उसे शुल्क व अन्य खर्चों के अतिरिक्त बंगाल में कम से कम एक करोड़ पचास लाख रुपये की व्यवस्था करनी होगी।

(ii) विश्वविद्यालयों में इण्टरमीडिएट परीक्षा के छात्रों को ही प्रवेश दिया जाये और बी० ए० का पाठ्यक्रम तीन वर्ष कर दिया जाये।

(iii) माध्यमिक शिक्षा का समुचित विकास करने के लिए उसके पाठ्यक्रम का विभिन्नीकरण कर दिया जाये और शिक्षा का उद्देश्य केवल विश्वविद्यालयों में प्रवेश करना ही हो।

(iv) इण्टरमीडिएट की कक्षाओं को विश्वविद्यालयों से अलग कर दिया जाये और इनके लिए अलग से इण्टर कालेज की स्थापना की जाये।

(v) इण्टर कालेजों को हाईस्कूल के साथ संलग्न न कर स्वतन्त्र रूप से संचालित करना चाहिए।

(vi) इण्टर कालेजों में चिकित्सा, कृषि, वाणिज्य विज्ञान के अध्ययन की व्यवस्था की जाये।

(vii) इण्टरमीडिएट कालेजों में छोटी-छोटी कक्षायें होनी चाहिएं जिससे कि अध्यापकों व छात्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो सकें।

(viii) इण्टर कालेजों के विद्यार्थियों के लिए ट्यूटोरियल और सेमिनार्स की व्यवस्था की जाये।

(ix) इण्टर कालेजों में भारतीय भाषाओं के अध्ययन की भी समुचित व्यवस्था की जाये।

(x) हाईस्कूल तक भारतीय भाषायें शिक्षा का माध्यम बनाई जा सकती हैं पर सब विषयों में नहीं और इण्टर कालेजों में तो केवल अंग्रेजी भाषा ही शिक्षा का माध्यम होनी चाहिए।

(xi) माध्यमिक विद्यालयों में छात्रावासों का भी प्रबन्ध किया जाये।

(xii) प्रत्येक प्रान्त में माध्यमिक शिक्षा परिषद की स्थापना की जाये जो कि हाईस्कूल और इण्टर कालेजों के लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण करने के साथ-साथ उनका निरीक्षण और नियन्त्रण भी करेगी।

(xii) उक्त शिक्षा परिषदों को शिक्षा विभाग के नियन्त्रण से मुक्त रखा जाये तथा उनकी प्रबन्धकारिणी समिति में सरकार, विश्वविद्यालय, इण्टर कालेजों व माध्यमिक विद्यालयों के प्रतिनिधि रखे जायें।

(xiv) “माध्यमिक शिक्षा परिषद” द्वारा हाईस्कूल और इण्टर कालेजों का निरीक्षण किया जाये तथा उसके द्वारा इन विद्यालयों पर नियन्त्रण हो।

(xv) प्रत्येक शिक्षा परिषद में गैर सरकारी सदस्यों का बहुमत रहना चाहिए।

(2) भारतीय विश्वविद्यालयों से सम्बन्धित सुझाव- कमीशन ने भारतीय विद्यालयों के कार्यों, संगठन, आन्तरिक प्रशासन के सम्बन्ध में जो सामान्य सुझाव प्रस्तुत किये उन्हें इस प्रकार दिया जा सकता है-

(i) विश्वविद्यालय पर आवश्यकता से अधिक नियन्त्रण और उनके शिक्षा सम्बन्धी कार्यों में हस्तक्षेप करने के कारण वह स्वेच्छा से कोई कार्य नहीं कर पाते। अतः उन्हें राजकीय नियन्त्रण से मुक्त कर शिक्षा सम्बन्ध में अधिक अधिकार दिये जायें।

(ii) विश्वविद्यालय के अध्यापकों को भी अधिक अधिकार दिये जायें।

(iii) परीक्षा, उपाधि वितरण, पाठ्यक्रमों में व शोधकार्यों के लिए एकेडमी की स्थापना की जायें।

(iv) प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक वैतनिक उपकुलपति नियुक्त होना चाहिए।

(v) विश्वविद्यालयों की तथा अध्यापकों व रीडरों आदि की नियुक्ति के लिए समिति बनाई जाय जिसमे शिक्षा विशेषज्ञ रखे जायें।

(vi) विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सीनेट के स्थान पर कोर्ट और सिंडीकेट के स्थान पर कार्यकारिणी परिषद की स्थापना की जाये।

(vii) पास कोर्स के अतिरिक्त ऑनर्स कोर्स की भी व्यवस्था करने का सुझाव दिया जाये।

(vii) बी० ए० का कोर्स तीन वर्ष का रखा जाये क्योंकि इससे छोटी अवस्था के छात्र विश्वविद्यालय में न आ पायेंगे और छात्रों व अध्यापकों का घनिष्ठ सम्बन्ध बढ़ने से शिक्षा का स्तर भी ऊँचा उठेगा।

(ix) विद्यार्थियों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक स्वास्थ्य शिक्षा संचालक की नियुक्ति की जाये।

(x) विश्वविद्यालय में अध्ययन, डॉक्टरी, कानून, कृषि, इन्जीनियरिंग आदि विभिन्न विषयों को उच्च शिक्षा की भी व्यवस्था की जाये।

(xi) आयोग ने विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों के पारस्परिक सम्बन्ध पर जोर देते हुए दो प्रकार के महाविद्यालयों का समर्थन किया-

(a) ऐसे सम्बद्ध महाविद्यालय जो कि विश्वविद्यालय के क्षेत्र से बाहर होंगे।

(b) ऐसे महाविद्यालय जो विश्वविद्यालय के क्षेत्र के अन्दर होंगे और एक दृष्टि से उसके अंग ही हो जायेंगे।

(xii) कमीशन का विचार था कि भारतीय मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए हैं। अत: उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन देने को कहा जाना चाहिए।

(3) कलकत्ता विश्वविद्यालय सम्बन्धी सिफारिशें- आयोग को मूलतः कलकत्ता विश्वविद्यालय सम्बन्धी समस्याओं पर विचार करने का ही कार्य सौंपा गया था। अतः इस सम्बन्ध में वह सभी प्रमुख समस्याओं की गहन अध्ययन कर इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि-

(1) इस विश्वविद्यालय का आधार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

(a) उससे सम्बन्धित कालेजों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस विश्वविद्यालय का आधार भी तथा इससे सम्बद्ध कालेजों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या भी बहुत अधिक हो गई है। इन्हीं कारणों से कमीशन ने यह मान लिया कि कलकत्ता विश्वविद्यालय को प्रबन्ध सम्बन्धी कठिनाइयाँ सहनी पड़ी और इस सम्बन्ध में उसने निम्न सुझाव दिये-

(a) शीघ्र ही ढाका में एक आवास-शिक्षण विश्वविद्यालय की स्थापना की जाये।

(b) कलकत्ता नगर में स्थित सभी शिक्षण संस्थाओं को इस प्रकार संगठित किया जाये कि वह सब मिलकर शिक्षा प्रदान करने वाले एक विश्वविद्यालय का रूप धारण कर सकें।

(c) कलकत्ता नगर के समीपवर्ती कालेजों को इस प्रकार संगठित किया जाये कि कछ थोडे से स्थानों पर विश्वविद्यालय केन्द्रों के क्रमिक विकास को प्रोत्साहित करना सम्भव हो सके।

(4) व्यावसायिक शिक्षा- अपने निरीक्षण के आधार पर आयोग इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि भारत में व्यावसायिक शिक्षा का अभाव है। अतः उसने इस सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत किये-

(i) इण्टरमीडिएट कक्षाओं में आवश्यकतानुसार व्यावसायिक शिक्षा को सम्मिलित कर विद्यालयों में उसके प्रति अभिरुचि उत्पन्न की जाये।

(ii) विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक और जीवनोपयोगी व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

(5) अध्यापकों का प्रशिक्षण- आयोग की दृष्टि से माध्यमिक विद्यालयों में जब तक प्रशिक्षित अध्यापकों का अभाव रहेगा तब तक देश में शिक्षा का समुचित विकास असम्भव है। अत: उसने इस दिशा में निम्न सुझाव दिए-

(i) प्रशिक्षित अध्यापकों की संख्या बढ़ाई जाये।

(ii) इण्टरमीडिएट, बी० ए० के पाठ्यक्रम में शिक्षा को भी एक पृथक विषय मानकर सम्मिलित किया जाये।

(iii) कलकत्ता और ढाका विश्वविद्यालय में शिक्षा विभाग की स्थापना की जाये।

(6) औद्योगिक शिक्षा- आयोग की दृष्टि से भारत के औद्योगिक विकास के लिए औद्योगिक शिक्षा क अत्यन्त आवश्यकता है। अतः उसने इसमें भी निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत किये-

(i) विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में प्रयोगात्मक विज्ञान और विभिन्न विषयों की औद्योगिक शिक्षा को सम्मिलित कर उनकी शिक्षा का समुचित प्रबन्ध किया जाये।

(ii) उक्त विषयों के लिए परीक्षा की व्यवस्था, उत्तीर्ण छात्रों को उपाधियाँ व प्रमाण पत्र दिये जायें।

(7) स्त्री शिक्षा- वस्तुतः भारतीय शिक्षा की प्रगति तब तक अपूर्ण ही समझी जायेगी जब तक कि देश की महिलाओं में शिक्षा का प्रसार न होगा, अतः इस कार्य की पूर्ति के लिए आयोग ने निम्न सुझाव दिये-

(i) पन्द्रह-सोलह वर्ष तक की बालिकाओं के लिए पृथक स्कूल खोले जायें जहाँ कि पर्दे की व्यवस्था हो।

(ii) जहाँ पर अलग से स्त्रियों के लिए विद्यालय न हों वहाँ-वहाँ पर सहशिक्षा की व्यवस्था की जाये।

(iii) कलकत्ता विश्वविद्यालय में एक स्पेशल बोर्ड ऑफ वूमेन एजूकेशन की स्थापना की जाये जो कि महिलाओं के लिए पाठ्यक्रम निर्धारित करें।

(iv) महिलाओं के लिए चिकित्सकीय शिक्षा की व्यवस्था हो ।

(v) महिलाओं को प्रशिक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जाये और उन्हें पूरी सुविधाएँ भी प्राप्त हों।

(vi) अन्तर विश्वविद्यालय परिषद-सैडलर कमीशन ने विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों के कार्यों में तारतम्यता रखने की दृष्टि से एक अन्तर विश्वविद्यालय परिषद की स्थापना का भी सुझाव दिया।

सैडलर आयोग का भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा पर प्रभाव

सैडलर आयोग की रिपोर्ट का मुख्य आधार यद्यपि कलकत्ता विश्वविद्यालय था, परन्तु यह समस्त भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए ज्योति स्तम्भ सिद्ध हुई। इसने भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात किया। सैडलर आयोग के सुझावों को ब्रिटिश शासन काल में तो माना ही गया, आज भी इसके संशोधनों को मान्यता दी जाती है। भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शिक्षा विषय को स्थान देने की सिफारिश इसी आयोग ने की थी।

आयोग की सिफारिशें व्यावहारिक थी, इसलिए इन्हें क्रियान्वित करने में असुविधा नहीं हुई तथा इनको लागू करने से विश्वविद्यालयों के संगठन एवं प्रशासन में महत्वपूर्ण सुधार हुए।

भारतीय शिक्षा पर सैडलर कमीशन की सिफारिशों को जो प्रभाव पड़ा, वह निम्नांकित है-

(1) मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया।

(2) आयोग ने शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाने की दिशा में अच्छी भूमिका निभायी।

(3) छात्रों के स्वास्थ्य, निवास आदि के विषय में सुझाव देकर आयोग ने छात्र कल्याण की ओर विश्वविद्यालय का ध्यान आकर्षित किया।

(4) स्त्री-शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करके शिक्षा के एकांगी स्वरूप को बदल दिया।

(5) विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में प्राविधिक, प्रौद्योगिक और व्यावसायिक शिक्षा को उचित स्थान देकर आयोग ने शिक्षा को अधिक जीवनोपयोगी बना दिया।

(6) अध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की, जिससे शिक्षा का स्तर ऊँचा हुआ।

(7) विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में प्राविधिक, प्रौद्योगिक और व्यावसायिक शिक्षा को उचित स्थान देकर आयोग ने शिक्षा को अधिक जीवनोपयोगी बना दिया।

(8) विश्वविद्यालय केवल परीक्षा लेने वाली संस्था नहीं, बल्कि उच्च अध्ययन एवं अनुसन्धान के केन्द्र बन जाये।

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Pankaja Singh

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