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सांप्रदायिकता दूर करने के लिए गांधी जी के प्रयत्न | गांधी जी की असफलता

सांप्रदायिकता दूर करने के लिए गांधी जी के प्रयत्न | गांधी जी की असफलता

सांप्रदायिकता दूर करने के लिए गांधी जी के प्रयत्न

(सांप्रदायिकता दूर करने के लिए गांधी जी के प्रयत्न) – महात्मा गांधी हिन्दू-मुस्लिम एकता को भारत की स्वाधीनता के लिए एक अनिवार्य शर्त मानते थे। इसलिए उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए भरसक चेष्टा की। अंग्रेज शासक मुसलमानों को हिन्दुओं से लड़ाना चाहते थे और इसके लिए उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देते रहते थे। इस कारण गांधी जी का काम दुःसाध्य हो गया था। फिर भी उन्होंने मुसलमानों को प्रसन्न करने और पक्ष में खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस सम्बन्ध में उनके निम्नलिखित प्रयत्न उल्लेखनीय है:- 

(1) खिलाफत आन्दोलन- सन् 1919 में प्रथम विश्व युद्ध में जीतने के बाद अंग्रेजों तथा उनके साथी देशों ने टर्की के सुल्तान को खलीफा (मुसलमानों का धर्म गुरु) पद से हटा दिया। इससे भारत के मुसलमान बहुत क्षुब्ध हुए। गांधी जी के कहने पर कांग्रेस ने खिलाफत (खलीफा को बनाये रखने के लिए किये गये) आन्दोलन का समर्थन किया। कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हो गई है। परन्तु यह भ्रम बहुत थोड़ी देर ही रहा। शीघ्र ही मुस्लिम जनता मुस्लिम लीग के साथ हो गई।

(2) मुसलमानों को कांग्रेस में ऊंचे पद दिये गये- मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए और दुनिया पर यह प्रभाव डालने के लिए कि मुसलमान कांग्रेस के साथ हैं, मुसलमानों को कांग्रेस में ऊँचे पद दिये गये। केन्द्रीय विधानसभा में अब्दुल कयूम खां को कांग्रेस दल का उपनेता बनाया गया। दाऊद गजनवी और उसके बाद इफ्तिखारुहीन पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने पर मौका अति ही ये तीनों मुस्लिम लीग में सम्मिलित हो गये। मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये। वह मरते दम तक कांग्रेसी रहे। परन्तु मुसलमान उन्हें अच्छी नजर से नहीं देखते थे।

(3) जिन्ना को कोरा चैक- मुस्लिम लीग के अध्यक्ष श्री मुहम्मद अली जिन्ना को गांधी जी राजनीतिक कोरा चैक दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए श्री जिन्ना जो भी शर्ते रखना चाहे, वे हमें स्वीकार है। परन्तु श्री जिन्ना इस पर भी कांग्रेस से समझौते के लिए राजी नहीं हुए। सन् 1945-46 में गांधी जी ने जिन्ना को मनाने के लिए बार-बार प्रयल किये, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

(4) प्रार्थना में कुरान का पाठ- गांधी जी अपनी सार्वजनिक प्रार्थना में गीता, बाइबिल, कुरान आदि सभी धर्मों के ग्रन्थों का पाठ करवाते थे। कुरान के पाठ का उद्देश्य हिन्दुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित कराना था।

(5) दंगे रुकवाने के लिए अनशन- एक से अधिक बार गांधी जी ने हिन्दू-मुस्लिम दंगों को रुकवाने के लिए अनशन (उपवास) के अस्त्र का प्रयोग किया। दंगे रुक भी गये।

(6) नोआखाली की यात्रा- सन् 1947 में नोआखाली में भारी हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए या यह कहना सही होगा कि बहुसंख्यक मुसलमानों ने अल्पसंख्यक हिन्दुओं का बहुत बड़े पैमाने पर वध और अपहरण किया। उनकी सम्पत्ति लूट ली और घर जला दिये। तब गांधी जी ने हिन्दुओं को सान्त्वना देने के लिए नोआखाली की पदयात्रा की।

गांधी जी की असफलता-

हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित कराने में गांधी जी असफल रहे। इसका बड़ा कारण यह था कि अंग्रेज मुसलमानों को निरन्तर बढ़ावा देते रहते थे। जितना कुछ गांधी जी देने का वायदा करते थे, उससे अधिक अंग्रेज देने को तैयार रहते थे। अतः मुसलमान अंग्रेजों के साथ ही रहे। गांधी जी देश का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण नहीं चाहते थे। पर अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर मुसलमानों ने इन्हीं की मांग की और अपनी मांग पूरी करवा ही ली।

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Pankaja Singh

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