शिक्षाशास्त्र

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग | यू०जी०सी० के कार्य | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कार्य-क्षेत्र

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग | यू०जी०सी० के कार्य | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कार्य-क्षेत्र

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

(University Grant Commission: U.G.C.)

भारतीय संसद ने सन् 1956 में एक अधिनियम बनाकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की। सरकार और विश्वविद्यालय की कड़ी के रूप में एक ऐसी संस्था की स्थापना करना जिसके सदस्य राजनीतिक सम्बद्धता के कारण नहीं बल्कि ज्ञान और शैक्षिक स्थान के आधार पर चुने जाते हैं। वास्तव में राष्ट्र-मण्डलीय युक्ति है। संयुक्त राज्य (यू० के०) की विश्वविद्यालय अनुदान समिति 1919 में स्थापित की गई थी जब विश्वविद्यालयों के वित्तीय असंतुलन से संयुक्त राज्य सरकार बहुत चिन्तित थी।

संयुक्त राज्य कोष ने विश्वविद्यालय शिक्षा की वित्तीय आवश्यकताओं की जाँच-पड़ताल करने के लिए तथा संसद द्वारा दिये जा सकने वाले अनुदान की प्रयुक्ति पर सरकार को मन्त्रणा देने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान समिति के नाम से एक स्थाई समिति का प्रारम्भ किया। भारतीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 1956 में स्थापित हुआ। ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय आयोग 1956 में,न्यूजीलैण्ड का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 1961 में और श्रीलंका विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 1962 में । ये सब संस्थायें उसी प्रयोजन के लिए स्थापित हुईं जिसके लिये ब्रिटिश विश्वविद्यालय अनुदान समिति 1919 में स्थापित हुई थी। इन सब संस्थाओं को ब्रिटिश विश्वविद्यालय अनुदान समिति के 45 वर्षों के अनुभव का लाभ प्राप्त है।

इसी प्रकार गैर राष्ट्रमण्डलीय देशों में इसके सदृश संस्था है अमेरिका की साइंस फाउण्डेशन जो 1950 में स्थापित हुई और जो अमेरिकी सरकार की संघीय निधि से भौतिक, सामाजिक और जैव विज्ञानों के सम्पूर्ण क्षेत्र में आधारभूत अनुसंधान के लिये मुख्यतः कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को अनुदान द्वारा आश्रय और परामर्श देगी। भारत सरकार का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ब्रिटिश अनुदान समिति से थोड़ा अलग ढंग से कार्य करता है, क्योंकि इसे वैधानिक अधिकार प्राप्त है और इसके कार्य संसदीय अधिनियम के अधीन सम्पादित होते हैं। इसके अतिरिक्त संविधान की अनुसूची 7 प्रविष्टि 66 में वर्णित संवैधानिक कर्त्तव्य भी इसकी शक्ति के स्रोत हैं। वास्तव में, संविधान के अनुसार भारत में शिक्षा का विषय राज्यों के अधीन है लेकिन प्रविष्टि 66 के अनुसार उच्च शिक्षा संस्थानों के स्तरों का समन्वय और निर्धारण केन्द्रीय सरकार का कर्तव्य है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम की धारा 12 के अधीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कार्य इस प्रकार बताये गये हैं- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का यह साधारण कर्त्तव्य होगा कि विश्वविद्यालय और अन्य संस्थाओं की राय में विश्वविद्यालय शिक्षा के उन्नयन और समन्वय के लिये तथा विश्वविद्यालय शिक्षा, परीक्षा तथा अनुसंधान के स्तरों के निर्धारण और अनुरक्षण के लिये यह ऐसे सब कार्य करे जो इसे समुचित लगें।’ इस धारा के अधीन आयोग को इस प्रकार के कार्य करने जरूरी हैं जैसे भारतीय विश्वविद्यालयों की वित्तीय आवश्यकताओं का पता लगाना और उनके स्तरों के अनुरक्षण एवं विकास के लिये निधियाँ देना।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नौ सदस्य होते हैं जिसमें सरकार द्वारा मनोनीत विश्वविद्यालय उपकुलपतियों की संख्या अधिकतम तीन होती है। देश की विश्वविद्यालय शिक्षा के अनुभव, ज्ञान तथा निष्पक्षता के आधार पर इन्हें चुना जाता है। सरकार का प्रतिनिधित्व दो अधिकारी, सामान्यतः वित्त सचिव और शिक्षा सचिव करते हैं। अन्य चार सदस्य प्रसिद्ध शिक्षाविद् और उच्च शैक्षिक योग्यता वाले व्यक्ति होते हैं। इनमें से एक को आयोग का अध्यक्ष बनाया जाता है। केन्द्र या राज्य सरकार के अधिकारी अध्यक्ष नहीं बन सकते। आयोग के प्रथम अध्यक्ष डॉ. सी. डी. देशमुख थे जो विश्वविद्यालय के उपकुलपति और भारत सरकार के वित्त मंत्री जैसे पदों पर भी रहे। बाद में दौलत सिंह कोठारी इसके अध्यक्ष रहे जो शिक्षा आयोग (1964-66) के भी अध्यक्ष थे।

उच्च शिक्षा के विकास के लिये आयोग अनेक प्रकार से कार्य करता रहा है, जैसे, उच्च अध्ययन केन्द्रों की स्थापना, विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, विशेष रूप से विज्ञान के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिये ग्रीष्मकाली कक्षाओं का आयोजन आदि। आयोग उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिये निरन्तर प्रयास कर रहा है।

भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

(U.G.C. in India)

सरकार द्वारा 1948 में नियुक्त ‘विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के सुझाव के अनुसार 1953 में  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की गई। 1956 में संसद के एक अधिनियम के द्वारा इसे एक स्वतंत्र संस्था स्वीकार कर लिया गया। इस अधिनियम के अनुसार अध्यक्ष के अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 9 सदस्य होंगे, उसमें से 3 विश्वविद्यालयों के उप-कुलपति,4 प्रसिद्ध भारतीय शिक्षा मर्मज्ञ एवं 2 केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि होंगे।

आयोग का संगठनात्मक स्वरूप

(Organizational Pattern of the Commission)

इसमें भारत सरकार द्वारा नियुक्त सदस्य होते हैं। इनमें तीन से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलपति नहीं हो सकते, दो पदाधिकारी सरकारी प्रतिनिधित्व करने के लिए होते हैं और शेष उन लोगों में से लिए जाते हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न विषयों का पूरा ज्ञान रखते हैं जो योग्य और विद्वान भी हों। इसका अध्यक्ष सरकारी अफसर नहीं है किन्तु उसे भी भारत सरकार मनोनीत करती है।

भारत सरकार न केवल इस कमीशन के द्वारा संविधान में प्रदान किये गए उत्तरदायित्वों को भली-भाँति पूरा करने में सफल होती है वरन् उच्च संस्थाओं के स्तर को उचित रूप से निर्धारित करने में भी सफल होती है। विश्वविद्यालयी स्तर की शिक्षा के सम्बन्ध में क्या नीति होनी चाहिये, इस सम्बन्ध में भी यह निर्णय लेती है और विभिन्न शिक्षा संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करती है। अपने इन कार्यों को पूरा करने के लिए यू. जी० सी० एक्ट के अन्तर्गत विश्वविद्यालयों को न केवल आर्थिक सहायता ही करती है और न उसकी आर्थिक कठिनाइयों के सम्बन्ध में जाँच करती है बल्कि शिक्षा स्तर को ऊँचा उठाने में या उन्नत करने में जो कठिनाइयाँ होती हैं उन्हें भी जानने का प्रयत्न करती हैं। अपने ही फण्ड में से यह सभी विश्वविद्यालयों को आवश्यकतानुसार आर्थिक अनुदान प्रदान करती है। इसके साथ विशिष्ट उद्देश्य से भी विश्वविद्यालय को अनुदान देती है। अतः नवनिर्मित विश्वविद्यालय अनुदान कमीशन अपने कार्यों को कुशलता से पूरा करने में समर्थ है और आधुनिक काल में तो इसके कार्यों का क्षेत्र अब काफी विस्तृत हो गया है। यह योजना के अन्तर्गत व योजना से विलग दोनों ही प्रकार की क्रियाओं के लिये विश्वविद्यालयों को अनुदान देती है।

यू०जी०सी० के कार्य

(Functions of U.G.C.)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. विश्वविद्यालयों से उनकी परीक्षाओं, पाठ्यक्रमों, शोध कार्यों आदि के सम्बन्ध में सूचना प्राप्त करना ।
  2. केन्द्रीय सरकार एवं विश्वविद्यालयों में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देना और उनकी समस्याओं का समाधान करना।
  3. भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा के स्तर में समन्वय रखने और विश्वविद्यालय शिक्षा से सम्बन्धित समस्याओं पर एक विशेष संस्था के रूप में केन्द्रीय सरकार को सलाह देना।
  4. विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार करने और शिक्षण के स्तर को ऊँचा उठाने के लिये विश्वविद्यालयो को परामर्श देना।
  5. विश्वविद्यालयों को अपने कोष में से दिये जाने वाले धन का वितरण करना और इस सम्बन्ध में अपनी नीति निर्धारित करना।
  6. विश्वविद्यालय शिक्षा के विस्तार एवं विकास से सम्बन्धित आवश्यक कार्यों को सम्पन्न करना।
  7. विश्वविद्यालयों की आर्थिक आवश्यकताओं की जाँच करना और केन्द्रीय सरकार द्वारा उनको सहायता अनुदान में दिये जाने वाले धन के सम्बन्ध में सुझाव देना ।
  8. विश्वविद्यालय के लिये उपयुक्त समझी जाने वाली सूचनाओं को भारत तथा विदेशों से एकत्र करके विश्वविद्यालयों को प्रेषित करना।
  9. विश्वविद्यालयों द्वारा विविध सेवाओं के लिये प्रदान की गई उपाधियों के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार और सरकार को अपनी सम्मति देना।
  10. नवीन विश्वविद्यालयों की स्थापना एवं पुराने विश्वविद्यालयों के कार्य क्षेत्र की वृद्धि के सम्बन्ध में पूछे जाने पर अपना मत व्यक्त करना ।

हर्ष का विषय है कि ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ अपने कर्तव्यों का सतर्कता से पालन कर रहा है, जिसके फलस्वरूप विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में अभिनन्दनीय विकास हो रहा है । वस्तुत: भारत सरकार ने आयोग की स्थापना करके महान आवश्यकता की पूर्ति की है।

आयोग के दायित्व

(Responsibilities of the Commission)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत इसके निम्नांकित दायित्व बताये गये हैं-

  1. विश्वविद्यालयों के शैक्षिक स्तर का निर्धारण करना और उन्हें बनाये रखने के सुझाव बताना।
  2. विश्वविद्यालय शिक्षा के उन्नयन के सम्बन्ध में उनसे तथा अन्य संस्थाओं से परामर्श लेना तथा आवश्यक कदम उठाना।
  3. विश्वविद्यालयों की परीक्षा एवं अनुसंधान कार्यों का स्तर ऊँचा उठाने और उनमें समन्वय लाने के लिये समुचित व्यवस्था करना।
  4. विश्वविद्यालय में परस्पर समन्वय एवं सहयोग बढ़ाने के लिये समुचित उपाय करना ।

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आयोग को अधिकार है कि वह-

  1. विश्वविद्यालयों को उनकी सभी साधारण या कुछ विशेष आवश्यकताओं के लिये धनराशि प्रदान करे।
  2. प्रान्त एवं केन्द्र सरकारों को विश्वविद्यालयों को धन उपलब्ध करवाने के सम्बन्ध में सुझाव दे ।
  3. उनको विकास कार्यों के लिये धन उपलब्ध करवाये।
  4. विद्यालयों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूछताछ करे।
  5. उनको शैक्षिक विकास के लिये सुझाव दे तथा उपाय सुझाये ।
  6. दुनिया के अन्य देशों के विश्वविद्यालयों की शिक्षा के सम्बन्ध में उपयोगी जानकारी एकत्र करे और विश्वविद्यालय के साथ आदान-प्रदान करे।
  7. उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक सभी काम करे।
  8. नये विश्वविद्यालय की स्थापना के सम्बन्ध में माँगे जाने पर प्रदेश एवं केन्द्र सरकार को सलाह दे।

इसका अर्थ यह हुआ कि विश्वविद्यालयों तथा विश्वविद्यालय स्तर की अन्य संस्थाओं की सभी संस्थायें अपनी योजनाओं तथा आवश्यकताओं को आयोग के समक्ष प्रस्तुत करते हैं-

विगत दो पंचवर्षीय योजनाओं में आयोग ने निम्नलिखित योजनाओं के लिये क्तिीय सहायता प्रदान की है-

  1. प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र चलाने के लिये ।
  2. अध्यापक शिक्षा एवं उसमें अनुसंधान के लिये।
  3. उच्च स्तर की अनुसंधानपरक पुस्तकों के प्रकाशन के लिये अनुदान ।
  4. स्नातकोत्तर उच्च अध्ययन केन्द्र की स्थापना के लिये।
  5. अध्यापकों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिये अंशकालीन या ग्रीष्मकालीन संस्थाओं की योजना के लिये।
  6. विश्वविद्यालयों के विभिन्न शैक्षिक विभागों तथा मानविकी विकास एवं प्रौद्योगिकी के विकास के लिये।
  7. नये-नये क्षेत्रों में अनुसंधान करने के लिये।
  8. पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं को स्थापित करने और उनके विकास के लिये।
  9. विभिन्न विषयों पर पत्राचार पाठ्यक्रम चलाने के लिये।
  10. विचार-गोष्ठियाँ, सम्मेलन, प्रदर्शन आदि आयोजन करने के लिये।
  11. राष्ट्रीय एवं विशिष्ट योग्यता वाले प्रोफेसरों के पद सृजित करने के लिये।
  12. विद्वानों के परस्पर आदान-प्रदान के लिये।
  13. अध्यापकों के लिये आवास आदि का निर्माण करने के लिये।
  14. छात्रों के लिये पुस्तकें, बैंक, स्वास्थ्य केन्द्र, रोजगार सम्बन्धी परामर्श केन्द्र खोलने के लिये।
  15. अध्यापकों के वेतन, भत्ते आदि के स्तर में सुधार के लिये।
  16. चुने हुये विश्वविद्यालयों में संग्रहालयों की स्थापना के लिए।
  17. छात्रावासों एवं छात्रवृत्तियों के लिए।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कार्य-क्षेत्र

(Area of Function of University Grant Commission)

विकासात्मक योजनाओं के सम्बन्ध में यह विश्वविद्यालयों के आगन्तुकों के साथ पहले विचार-विमर्श कर लेती है जिससे कि उसे विभिन्न विश्वविद्यालयों की समस्याओं और आवश्यकताओं दोनों का ही पूरा ज्ञान हो जाये ताकि यह पर्याप्त मात्रा में उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान कर सके। वास्तव में इन समितियों का गठन इस उद्देश्य से ही किया गया है कि वे विभिन्न विश्वविद्यालयों में जाकर व्यक्तिगत स्तर पर विचार-विमर्श कर सकें और उनकी सभी कठिनाइयों के सम्बन्ध में यू. जी. सी. के समक्ष अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकें। यू० जी० सी० पुस्तकों को खरीदने, पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं में सुविधाओं को प्रदान करने, विज्ञान व अन्य विषयों के शिक्षण सम्बन्धी विभिन्न उपादानों को खरीदने तथा फर्नीचर आदि के लिये भी अनुदान प्रदान करती है। इसके साथ भवन निर्माण आदि के लिये आर्थिक सहायता देती है। उपरोक्त कार्यों से स्पष्ट हो जाता है कि यू. जी० सी० के कार्यों व उत्तरदायित्वों का क्षेत्र कितना अधिक विस्तृत है।

इन कार्यों के अतिरिक्त उसके कुछ अन्य कार्यक्षेत्र भी हैं जिनमें यह अधिक कुशलता से कार्य कर रही है। वह क्षेत्र निम्न है-

(1) शिक्षा स्तर में सुधार-

इस सम्बन्ध में कमीशन ने कई ऐसी समितियों का संगठन किया है और उन्हें परीक्षण हेतु नियुक्त किया है जो कि विभिन्न स्तरों पर जाकर इस बात का अध्ययन करे और कमीशन को इस सम्बन्ध में रिपोर्ट दे कि विश्वविद्यालय की शिक्षा का स्तर क्या है? इस दृष्टि से विश्वविद्यालय शिक्षा स्तर पर जो कमेटी गठित की गई है उसने इससे सम्बन्धित रिपोर्ट को कमीशन के समक्ष दे दिया है और कमीशन उस पर विचार भी कर रहा है । इसी दृष्टि से यू. जी० सी० ने कुछ विश्वविद्यालयों में ऐसे केन्द्र स्थापित किये हैं जो स्नातकोत्तर स्तर पर शोध कार्य को देख रहे हैं और शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं पर शोध कार्य के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी कर रहे हैं। केवल इतना ही नहीं वे इस स्तर पर शोध कार्य में  स्तर को और भी उन्नत करने का प्रयत्न कर रहे हैं जिससे कि गुणात्मक रूप में भी इस स्तर का विकास सम्भव हो सके। कुछ विश्वविद्यालयों में उसने विभागों को ही उच्च शिक्षा के अध्ययन के रूप में कार्य करने को मान्यता दे दी है।

(2) गर्मी की संस्थायें व पाठशालायें-

कमीशन शिक्षकों की शिक्षा की नवीन विधियों से परिचित कराने के लिये गर्मियों में इस प्रकार की संस्थायें अथवा सेमिनार आदि का संगठन करता है जिससे कि शिक्षकों को आसानी से शिक्षा की नवीनतम विचारधाराओं से अथवा मौलिक प्रवृत्तियों से पूरी तरह परिचित कराया जा सके। इसलिये यह विश्वविद्यालय को सहायता भी प्रदान करती है जिससे कि इस प्रकार की सुविधाओं को शिक्षकों को उपलब्ध कराने में समर्थ हो सके।

(3) पुनरावलोकन समिति-

समय-समय पर कमीशन अवलोकन समितियों का संगठन करता है जो विशिष्ट विधियों से सम्बन्धित आवश्यकताओं का अध्ययन करती है उनके शिक्षण स्तरों व शोध कार्यों का विश्लेषण करती है तथा उनके पाठ्यक्रमों का समाज की परिवर्तित आवश्यकताओं के रूप में अध्ययन करती है। इस सम्बन्ध में फिर कमीशन को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करती हैं। कमीशन उनकी दी हुई रिपोर्ट पर सुझाव व विचार करता है साथ ही उनकी रिपोर्ट को प्रकाशित करता है जिससे कि विश्वविद्यालय को उससे समुचित लाभ उठाने का अवसर प्राप्त हो सके।

(4) परीक्षा प्रणाली में सुधार-

परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिये यू. जी. सी. प्रयत्नशील है और इस सम्बन्ध में भी इसने 1965-66 में एक कमेटी संगठित की थी जिसका मुख्य उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में क्या कमियाँ हैं, उनका पता लगाकर उससे सम्बन्धित सुधार के विषय पर सलाह देना था। इस दृष्टि से कमेटी ने जो सुझाव दिये हैं कमीशन उन्हें व्यावहारिक रूप देने के लिये प्रयत्नशील है। कमीशन की सहायता से कुछ विश्वविद्यालयों ने परीक्षा सुधार यूनिट स्थापित कर लिये हैं।

(5) क्षेत्रीय अध्ययन-

कमीशन क्षेत्रीय अध्ययन के लिये भी विश्वविद्यालयों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है। इस योजना के अन्तर्गत उन क्षेत्रों या देशों की ऐतिहासिक, सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया जाता है जिनसे भारत का सम्पर्क है। इसके अन्तर्गत सम्बन्धित क्षेत्र की भाषा का शिक्षण और उपयुक्त विद्यार्थियों के मण्डल का उस क्षेत्र में भ्रमण सम्मिलित है जिससे कि विद्यार्थी इस सम्बन्ध में गहराई से व्यापक रूप से अध्ययन कर सकें।

(6) शिक्षकों का कल्याण-

इस दृष्टि से कमीशन ऐसी बहुत-सी क्रियाओं को संगठित करता है जिनसे शिक्षकों का हित सम्भव हो सके, जैसे-शिक्षकों के लिये नये वेतनमानों का निर्धारण करना, उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिये विभिन्न सुझावों को भारत सरकार और राज्य सरकारों को देना।

(7) शोधात्मक कार्यों में सहायता-

1963-64 में कमीशन ने शोधात्मक कार्यों के लिये भी एक योजना निर्मित की थी जिसका उद्देश्य विभिन्न लोगों को शोधात्मक कार्य के लिये प्रोत्साहन देना था। इसके लिये यू. जी. सी. विभिन्न शिक्षण संस्थाओं व विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है।

(8) शिक्षकों के आमन्त्रण हेतु-

इसके अन्तर्गत एक विश्वविद्यालय से शिक्षकों को दूसरे विश्वविद्यालय में बुलाया जाता है जिससे कि उन शिक्षकों की विद्वता, योग्यता और अनुभव से दूसरे विश्वविद्यालय के शिक्षक लाभ उठा सकें। ऐसा करने के लिये यू. जी. सी विश्वविद्यालयों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है जिससे कि एक विश्वविद्यालय दूसरे विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को आमन्त्रित कर सके।

(9) अवकाश ग्रहण शिक्षकों की सेवाओं को संगठित करना-

शिक्षा के विकास की दृष्टि से ही यू० जी० सी० अवकाश ग्रहण शिक्षकों के लिये इस प्रकार की योजना संगठित करती है जिससे कि उसकी सेवाओं का लाभ शिक्षा की विभिन्न समस्याओं के सुलझाव में उनके अवकाश के बाद भी प्राप्त किया जा सके। ऐसे शिक्षक शिक्षा से सम्बन्धित समस्याओं में शोधात्मक कार्यों के लिये हों। इसके लिये वह अवकाश ग्रहण शिक्षकों को 6 हजार रुपये साल में देने की व्यवस्था करती है साथ ही शोध कार्य में दूसरे स्थान पर जाने का जो यात्रा व्यय आता है उसे भी प्रदान करती है और उनकी रहने,खाने-पीने तथा अध्ययन सम्बन्धित आवश्यकताओं को पूरा करती है

(10) विद्यार्थियों का कल्याण-

यह केवल शिक्षकों के कल्याण सम्बन्धी कार्यों को ही संगठित नहीं करती बल्कि ऐसी क्रियाओं को भी हाथ में लेती है जिनके द्वारा विद्यार्थियों का हित भी सम्बन्धित हो, जैसे—यह विभिन्न संस्थाओं की ऐसी योजनाओं के लिये छात्रावास बनवाना, स्वास्थ्य सम्बन्धी केन्द्र स्थापित करना आदि बातों के लिये अनुदान प्रदान करती है।

(11) छात्रवृत्तियाँ-

विभिन्न क्षेत्रों में योग्य विद्यार्थी शोधात्मक कार्य के लिये प्रोत्साहित किये जा सकें और उनके द्वारा शिक्षा की उन्नति हो सके, इस दृष्टि से यह छात्रवृत्तियों की व्यवस्था भी करती है।

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Pankaja Singh

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