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बैरम खाँ | बैरम खाँ के पतन के कारण | बैरम खाँ के पतन का अध्ययन

बैरम खाँ | बैरम खाँ के पतन के कारण | बैरम खाँ के पतन का अध्ययन

बैरम खाँ

बैरम खाँ बदख्शाँ में पैदा हुआ था। वह शिया मत को मानने वाला था और उसने बाबर, हुमायूँ व अकबर आदि मुगल बादशाहों की अनन्य सेवा की थी। उसने अपनी स्वामिभक्ति का परिचय सबसे पहले चौसा व कन्नौज की लड़ाइयों में दिया। कन्नौज की लड़ाई में शेरशाह ने जब उसे कैद कर लिया तो उसकी स्वामिभक्ति से प्रसन्न कर उसने उसके साथ बन्दरियों का सा व्यवहार नहीं किया। चूंकि वह मुगलों का सच्चा सेवक था। अत: एक दिन वह कैदखाने से भाग निकला। वह हुमायूँ का अत्यन्त विश्वासपात्र था। जब हुमायूँ भारत से फारस भागा तो वह भी उसके साथ रहा। उसके शिया होने के कारण हुमायू को फारस से सहायता प्राप्त हो सकी। जब हुमायूँ भारत आया तो उसने बैरम खाँ को सेनापति के पद पर नियुक्त किया और भारत की पुनर्विजय में उसका बहुत बड़ा हाथ रहा। हुमायूँ उससे इतना प्रसन्न हुआ कि उसने उसको खानखाना की उपाधि प्रदान की व उसे अकबर का अभिभावक नियुक्त किया।

हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात् बैरम खाँ ने तुरन्त अकबर का राज्याभिषेक कर दिया। उसके कहने से अमीरों ने अकबर को बादशाह मान लिया। राज्याभिषेक के समय का हाल लिखते हुए अहमद यादगार लिखता है । दरबार में बैरम खाँ ने जनता का भारी स्वागत किया। एक विशाल सभा मण्डप को सुनहरी काम की साटन से सजाया गया जिससे वह किसी उद्यान की पुष्पक्यारी अथवा स्वयं स्वर्ण की भाँति दिखाई देने लगा। उस पर विभिन्न रंगों के कालीन बिछवाये गये और उन पर बैरम जनता के लिए खोल दिया गया। चंगताई अमीरों को बहुमूल्य सम्मान सूचक वस्त्र तथा अन्य शाही उपहार देकर, प्रसन्न किया गया और साथ ही साथ उन्हें भविष्य में अनुग्रहीत करने का वचन दिया गया। बैरम खाँ ने कहा यह श्रीमान सम्राट के शासन काल का प्रारम्भ है।

केवल राज्याभिषेक से ही अकबर भारत का सम्राट नहीं हो गया। उसके अनेक प्रतिद्वन्द्वी थे जिनमें सबसे प्रमुख हेमू था जो आदिलशाह सूर का प्रधानमन्त्री था। इन सब प्रतिद्विन्द्वियों को हराने में वैरम खाँ ने अकबर की बहुत सहायता की। बैरम खाँ हेमू से लड़ने के लिए पानीपत के मैदान में आ खड़ा हुआ और यद्यपि अकबर हेमू की सैनिक शक्ति को देखकर डर गया परन्तु बैरम खाँ ने उसको आश्वासन दिया। उसने हेमू को हराया और मार डाला। यह वैरम खां की शक्ति की चरम सीमा थी।

यों तो बैरम खाँ का चरित्र व स्वभाव अच्छा था परन्तु धीरे-धीरे उसमें क्रोध, अहंकार, स्वेच्छाचारिता आदि दुर्गुण आ गये। यही उसके पतन का आरम्भ था। अब उस पर धीरे-धीरे आरोप लगाये जाने लगे और अकबर के हरम दल के लोग उसके विरुद्ध अकबर के कान भरने लगे । अतः अकबर ने उसको सत्ता पर प्रतिबन्ध लगाकर उसको उसके पद से हटा दिया। फिर अकबर के और उसके बीच व्यक्तिगत भेदभाव उत्पन्न होने लगे थे। अतः बैरम खां का पतन स्वाभाविक था।

बैरम खाँ के पतन के कारण

बैरम खाँ के पतन के निम्नलिखित कारण थे-

(1) बैरम खाँ शिया मत को मानने वाला था, जबकि मुगुल सुन्नी थे और उससे जलते थे। वे बैरम खाँ की शक्ति से द्वेष रखते थे और उधर बैरम खाँ शियाओं को उच्च पद दिया करता था जिससे सुन्नियों में उसके प्रति असन्तोष उत्पन्न हो चुका था और वे अकबर के कान भरने लगे कि बैरम खाँ पक्षपाती है। इन चुगलियों का अकबर पर बहुत असर हुआ।

(2) बैरम खाँ का चरित्र और स्वभाव अब खराब हो गया था। वह निरंकुश, क्रोधी, अहंकारी, ईर्ष्यालु और पापांध हो गया था। वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने लगा था। वह उदण्ड हो गया था और उसका व्यवहार दरबारियों के साथ बहुत असन्तोषजनक हो गया था। इस बात की भी शिकायतें अकबर के पास पहुंचती रहीं। उसकी संगत खराब हो चली थी और उसका आचरण असह्य हो गया था। इसके अतिरिक्त वह गुप्त षड्यन्त्र भी करने लग गया था।

(3) अकबर अब बड़ा हो रहा था। वह राज-काज को समझने लगा था और अपने ऊपर वह किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नहीं चाहता था। इससे बैरम खाँ को कुछ परेशानी होने लगी थी। उधर उसके प्रतिद्वन्द्वी उसकी शिकायतें कर करके अकबर को उसके विरुद्ध किये दे रहे थे।

(4) चूंकि अकबर अपनी सत्ता अब अपने हाथों में रखना चाहता था, अतः वह रुपयों, पैसों के मामलों में भी अब पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता था। अकबर को और उसके परिवार को खर्च के लिए उतना रुपया नहीं मिल पाता था जितना बैरम खाँ और उसके परिवार को जैसा कि स्मिथ ने लिखा है कि, “जब अकबर अपनी आयु के 18 वर्ष व्यतीत कर चुका, तब वह अपने को एक अनुभवी एवं परिपक्व पुरुष समझने लगा। अब उसको अपने अभिभावक के संरक्षण के बंधन खलने लगे। अतएव उसने नाम एवं व्यवहार दोनों ही दृष्टि से सम्राट बनने का दृढ़ निश्चय कर लिया।”

(5) हरम दल बराबर बैरम खाँ के प्रति षड्यन्त्र रच रहा था। अकबर की माँ हमीदाबानू वेगम, उसकी धाय माहन अनगा और उसका पुत्र अधम खाँ और दिल्ली का सूबेदार शाहबुद्दीन आदि षड्यन्त्रकारियों ने अकबर को भड़काया। निजामुद्दीन लिखता है कि, “कुछ ऐसे ईर्ष्यालु तथा बैर-भाव रखने वाले व्यक्ति थे जो स्वयं सम्राट के कृपापात्र बनने का प्रयत्न करते रहते थे और अवसर मिलने पर सम्राट का मस्तिष्क खराब करने के उद्देश्य से बैरम खाँ की चुगली करने से नहीं चूकते थे।”

(6) इस समय तक बैरम खाँ और अकबर के बीच में कुछ मतभेद उत्पन्न हो गए थे और कुछ घटनाएँ ऐसी थी जिन्होंने अकबर को बैरम खाँ के विरुद्ध कर दिया। उदाहरण के लिए बैरम खाँ ने तारदीवेग को मरवा डाला क्योंकि वह हेमू से पराजित होकर भाग खड़ा हुआ था। यह अमीर हुमायूँ का स्वामिभक्त सेवक था। उसकी इस हत्या से अमीरों में बैरम खाँ के प्रति विद्रोहात्मक भावनाएँ भर गई। दूसरे, बैरम खाँ ने शेख गदाई नाम के एक शिया को प्रधान न्यायाधीश के पद पर नियुक्त करके सुन्नियों की धार्मिकता पर आधात किया था। तीसरे, एक दिन हाथियों की एक लड़ाई में एक हाथी बैरम खाँ के खेमे को तोड़कर भाग गया जिससे बैरम खाँ ने महावत को कठोर दण्ड दिया। चौथे, बैरम खाँ ने मुल्ला पीर मुहम्मद की जो कि अकबर का अध्यापक था, अलग करके अकबर को क्रोधित कर दिया।

(7) अन्तिम कारण बैरम खाँ का अन्य नीच व्यक्तियों के साथ षड्यन्त्र की योजना बनाना था जिसने अकबर को अत्यन्त क्रोधित कर दिया।

अत: अकबर ने अब्दुल लतीफ के हाथों, जो कि अकबर का शिक्षक था, यह सन्देश भेजा कि “क्योंकि अब तक आपकी ईमानदारी और वफादारी पर भरोसा था इसलिए मैं राज्य के सभी महत्वपूर्ण कार्य आपकी देखरेख में छोड़कर आनन्द में मस्त था। अब मैंने निश्चय किया कि राज्य की बागडोर अपने हाथ में ले लूँ। यह वांछनीय है कि आप मक्का की यात्रा के लिए चले जाएँ जिसका कि आपका बहुत दिनों से इरादा था। हिन्दुस्तान के परगनों का से कुछ हिस्सा आपको दे दिया जाएगा जिसका लगान आपको आपके एजेन्टों द्वारा मिलता रहेगा।”

इस सन्देश को पाकर बैरम खां ने अपने राजकीय चिन्ह और मुहर अकबर के पास भिजवा दिये और स्वयं मक्का की ओर चल दिया किन्तु उधर दरबारियों ने अकबर को भड़काकर मुल्ला पीर मुहम्मद के साथ एक सेना इस आशय से भेजी कि वह जल्दी ही बैरम खाँ को भारत के बाहर निकाल दें। अब बैरम खाँ के क्रोध की सीमा न रही, उसने विद्रोह कर दिया और मुगल सेना को हरा दिया किन्तु अन्त में स्वयं ही अकबर के पास आकर आत्मसमर्पण कर दिया और स्वयं मक्का की ओर रवाना हुआ। अभी वह राजस्थान होते हुए पाटन पहुंचा ही था कि मुबारक खाँ नामक एक व्यक्ति ने उसे मार डाला क्योंकि उसके पिता को बैरम खाँ ने मा डाला था। अकबर ने यह सुनते ही बैरम खाँ के कुटुम्ब को दरबार में बुला दिया और उसके पुत्र अब्दुल रहीम का स्वयं पालन-पोषण किया। यही बच्चा आगे चलकर खानखाना की उपाधि से विभूषित हुआ और हिन्दी जगत् का विख्यात कवि रहीम के दोहो ने उसे हिन्दी जगत् में महान् कर दिया।

बैरम खाँ के पतन का अध्ययन

यदि हम बैरम खाँ के पतन का आलोचनात्मक अध्ययन करें तो यह उचित न था। निम्न तर्क दिये जाते हैं-

(1) बैरम खाँ ने अत्यन्त स्वामिभक्ति के साथ बाबर, हुमायूँ और अकबर की निस्वार्थ सेवा की थी। हुमायूँ का भारत में पुनः लौटना, हेमू के विरुद्ध अकबर की विजय, अकबर की सिंहासन प्राप्ति सब बैरम खाँ के कारण ही थी।

(2) बैरम खाँ अभिमानी और कपुटी हो गया था। उस युग में यही था। ऐसा ही आदमी उस युग का नेता माना जाता था। अत: बैरम खाँ को पद से हटाने का कोई आधार न था।

(3) बैरम खाँ ने अकबर के प्रति विद्रोह किया था ऐसा उसने अपनी इच्छा से नहीं बल्कि परिस्थिति से बाध्य होकर किया था। वास्तव में विद्रोही था तो स्वयं आकर आत्मसमर्पण नहीं करता।

(4) बैरम खाँ अत्यन्त विनम्र, आज्ञाकारी और कर्तव्यपरायण था। अकबर की आज्ञा पाते ही अपने चिन्ह मुहर वापस भेज कर मक्का चला गया।

(5) अकबर को अपने उद्देश्य में पूर्ति नहीं मिली क्योंकि बैरम खाँ के बाद भी वह अपनी इच्छा से स्वतंत्र न हो सका था।

इनसे स्पष्ट है कि अकबर का व्यवहार खाँ के प्रति उचित और भद्र न था और उसने अपने दरबारी, अमीरों की सलाह से काम किया था।

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Pankaja Singh

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