समाज शास्‍त्र

समाजवाद का अर्थ | समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ

समाजवाद का अर्थ | समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ | Meaning of socialism in Hindi | Main features of socialism in Hindi

समाजवाद का अर्थ

समाजवाद के अर्थ के संबंध में व्यक्ति पूर्ण सहमत नहीं हैं। समाजवाद के संबंध में विभिन्न समाजवादियों ने अपने-अपने विचार किए हैं। क्योंकि उन्होंने इसे अलग-अलग ढंग से समझा ही है।

जीड के अनुसार- संक्षेप में समाजवाद एक ऐसी टोपी है। जिसकी शक्ल सभी लोगों के पहने जाने के कारण बिगड़ गयी है। कुछ लोग समाजवाद को केवल एक भावना मानते है जो युवक के हृदय में आवश्यक रूप से उत्पन्न होती हैं और बाद में उम्र बढ़ने या समय आने के बाद समाप्त हो जाती है। स्वीडन के राजा ने एक बार कहा था, यदि कोई व्यक्ति 25 वर्ष की आयु तक समाजवादी नहीं तो वह इससे स्पष्ट होता है कि उसका हृदय नहीं है, परंतु यदि वह 25 वर्ष की आयु के बाद भी समाजवादी बना रहता है तो स्पष्ट है कि उसका मस्तिष्क नहीं है।

डॉ. तुगन वानोव्स्की का मत है कि समाजवाद का तत्व यह है कि उसके अंतर्गत समाज के किसी व्यक्ति का शोषण नहीं हो सकता। वर्तमान आर्थिक व्यवस्था लाभ की प्रवृत्ति के आधार पर चल रही है परंतु समाजवाद के अंतर्गत उसका उद्देश्य अधिकतम कल्याण प्राप्त करना होता है। वस्तुओं का उत्पादन समाज के लिए उनकी उपयोगिता के आधार पर होता है।

प्रो. डिक्सन के शब्दों में, ‘समाजवाद समाज का एक ऐसा आर्थिक संगठन है। जिसके अंतर्गत एक साधारण योजना के अनुसार उत्पादन के भौतिक साधनों पर पूर्ण समाज का स्वामित्व है तथा समान अधिकारों के आधार पर समाज के सभी सदस्य समाजवादी आयोजन द्वारा किये गये उत्पादन का लाभ प्राप्त करते हैं।

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाजवाद एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसमें उत्पादन के साधनों पर किसी एक व्यक्ति का नियंत्रण व स्वामित्व न होकर सारे समाज का या राज्य का स्वामित्व एवं नियंत्रण होता है। इन साधनों का प्रयोग किसी एक व्यक्ति के हित में नहीं किया जाता है बल्कि सामूहिक हित में किया जाता है। परिणाम यह होता है कि मनुष्य का शोषण नहीं करने पाता।

समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ

(Main Characteristics of Socialisms)

समाजवाद को उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर इसकी भी निम्न विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती है।

  1. उत्पादन के साधनों का सामाजिक स्वामित्व- समाजवाद की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि इसमें उत्पत्ति के साधनों का स्वामित्व सरकार के पास रहता है। इसमें व्यक्तियों का निजी संपत्तियों पर न तो स्वामित्व होता है और न ही उत्पत्ति के साधनों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जाता है।
  2. आर्थिक नियोजन समाजवादी अर्थव्यवस्था पूर्णरूप से योजनाबद्ध होती है। नियोजन की आवश्यकता समाजवाद में इसलिए होती है कि वहाँ भूल्य-यंत्र (Price Mechanism) का अभाव होता है जिसके कारण उत्पत्ति के साधनों का वितरण विभिन्न उपयोग में ठीक से नहीं हो पाता। इसी कमी को पूरा करने के लिए समाजवाद में आर्थिक नियोजन अपनाया जाता है जिसमें समाज की ओर नियुक्त केंद्रीय नियोजन अधिकारी यह निश्चित करता है किस वस्तु का कहाँ और कितनी मात्रा में उत्पादन किया जायेगा।
  3. सामाजिक कल्याण की प्राप्ति समाजवादी अर्थव्यवस्था में उत्पत्ति के साधनों को विभिन्न उपयोगों में इस प्रकार से बाँटा जाता है कि समाज के सभी व्यक्तियों का अधिकतम कल्याण हो सके।
  4. आर्थिक समानता- इस अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति और लाभोपार्जन की प्रवृत्ति को समाप्त कर दिया जाता है जिसके कारण इस प्रकार की व्यवस्था में आर्थिक असमानताएँ उत्पन्न नहीं हो पाती।
  5. मानवीय आदर्शों का अधिक महत्व- समाजवाद में भौतिकता के स्थान पर मानव आदर्शों व मातृभाव को अधिक महत्व दिया जाता है।
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