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पर्यावरणीय आन्दोलनों के सामाजिक महत्त्व | ‘गंगा बचाओ’ आन्दोलन | गंगा की वर्तमान दशा और कारण

पर्यावरणीय आन्दोलनों के सामाजिक महत्त्व | ‘गंगा बचाओ’ आन्दोलन | गंगा की वर्तमान दशा और कारण

पर्यावरणीय आन्दोलनों के सामाजिक महत्त्व

पर्यावरणीय आन्दोलन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चलाए जाने वाले आन्दोलन हैं। पर्यावरण सम्पूर्ण मानव जाति एवं सम्पूर्ण भू परिवेश से सम्बन्धित है इसलिए पर्यावरणी आन्दोलनों का समस्त विश्व के लिए महत्त्व है। भारत में अनेक आन्दोलन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चलाए गए हैं, जिनमें प्रमुख है- सुन्दरलाल बहुगुणा एवं उत्तराखण्ड के लोगों द्वारा चलाया गया ‘चिपकों आन्दोलन’ मेघा पाटकर का नमृदा बचाओं आन्दोलन एवं बाबा आम्टे का जंगल बचाओं आन्दोलन आदि। इन सभी आन्दोलनों का सामाजिकमहत्त्व निम्नलिखित है-

(1) पर्यावरणीय आन्दोलन किसी व्यक्ति अथवा स्थान विशेष के लिए न होकर वैश्विक महत्त्व के आन्दोलन हैं। इसलिए इनकी महत्ता अत्यधिक है।

(2) पर्यावरणीय आन्दोलन ऐच्छिक आन्दोलन हैं एवं अधिकांशतः गाँधी वादी अर्थात् अहिंसक प्रकृति के होते हैं।

(3) पर्यावरणीय आन्दोलन समाज के लिए सकारात्मक होते हैं तथा इससे सम्पूर्ण समाज को लाभ होता है।

(4) पर्यावरणीय आन्दोलन प्रकृति से मानव का सीधे नाता जोड़ते हैं एवं मानव को भविष्य के सम्बन्ध में सचेत कर उसकी अविवेकशील प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर भावी समाज को जीने लायक बनाने में सहयोग देते हैं।

(5) पर्यावरणीय आन्दोलनों का उद्देश्य एवं कार्य समाज में ऐसे परिवर्तनों को दिशा देना है। जिससे समाज स्वयं को बनाए एवं बचाए रख सके।

(6) पर्यावरणीय आन्दोलन विकास कीऐसी अंधी दौड़ को समाप्त करने के पक्षमें हैं जिससे कि आगामी समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता हो।

‘गंगा बचाओ’ आन्दोलन

गंगा को भारत में मात्र एक नदी ही नहीं माँ का दर्जा दिया जाता है। गंगा अपनी सहायक नदियों के साथ भारत की सर्वाधिक लम्बी नदी प्रणाली है। इससे लाखों हेक्टेयर भूमि सिंचित होती हे, अनेक प्रकार की मछलियों व अन्य जीवों का एक प्राकृतिक आवास है और प्रत्येक भारतीय अपने जीवन काल में अनेक बार इसमें हुबकी लगाकर स्नान करने के लिए ललायित रहता है। तीज त्यौहारों के अवसारों पर इसके घाटों पर मेले लगते हैं। भारत का बड़ा मेला-कुंभ, जो प्रत्येक बाहर वर्ष बाद आयोजित किया जाता है गंगा के घाट पर ही सजता है। गंगा की सुबह सायं नित्य आरती उतारी जाती है और गंगा का जल प्रत्येक भारतीय के घर में पाई जाने वाली अमूल्य धरोहर होती है जिसे जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त अत्यधिक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ प्रयोग किया जाता है।

गंगा की वर्तमान दशा और कारण

यद्यपि गंगा को पतित पावनी के नाम से भी पुकारा जाता है और इसे पापों को नष्ट कर पोक्ष प्रदान करने वाली माना जाता है तथापि आज माँ गंगा जल हमारे ही अवैचारिक क्रिया-कलापों के कारण इतना प्रदूषित होता जा रहा है कि गई स्थानों पर यह पीने तो क्या स्नान करने लायक भी नहीं रहा है। अनेक जीव गंगा प्रदूषण के कारण भेंट चढ़ चुके हैं और अनेक दूसरे संकटग्रस्त प्रजातियों की श्रेणी में पहुंच चुके हैं। गंगा प्रदूषण के अनेक कारण है जिसमें तीन प्रमुख है-

(1) नगरों का गंदा जल नदी में छोड़ा जाना,

(2) उद्योगों से निकला अवशोषित जल एवं अपशिष्ट पदार्थों का गंगा में डाला जाना एवं तीनों ही कारण सभ्यता के विकास एवं आबादी के बढ़ने से अधिकाधिक विकराल होते जा रहे हैं।

‘गंगा बचाओ’ आन्दोलन

गंगा को प्रदूषण एवं भारी बाँधों के बनने से उपजे खते से निपटने के लिए गंगा के तटों के पास रहने वाले लोगों द्वारा गैर-सरकारी के माध्यम से गंगा बचाओं आन्दोलन चलाया जा रहा है। इस आंदोलन का उद्देश्य पर्यावरण एवं संस्कृति के हित में गंगा को इसके मूल स्वरूप में बनाए रखना हैं आन्दोलन की विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) गंगा पर बनने वाले बाँधों का पर्यावरण हित में विरोध करना।

(2) गंगा के आस-पास के क्षेत्र को प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से मुक्त रखना।

(3) गंगा उद्गम के ग्लेशियरों को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रयास करना।

(4) गंगा तटों पर बसे नगरों के विकास को गंगा के सह-अस्तित्व को ध्यान में रखकर किए जाने पर बल देना।

(5) बाद इत्यादि प्रकोपों से बचाव हेतु आपदा प्रबंधन की मजबूती के निमित्त आवाज उठाना।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि गंगा बचाव आन्दोलन गंगा, जो मात्र एक नदी नहीं भारतीय संस्कृति की उत्कर्ष पहचान है, को प्रदूषण एवं विकास की अंधी दौड़ से बचाने का एक आंदोलनकारी जन प्रयास है।

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