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गांधीवादी प्रारूप | विकास पर गाँधीवादी मॉडल | गांधीवादी विकास प्रारूप की अन्य विशेषताएं

गांधीवादी प्रारूप | विकास पर गाँधीवादी मॉडल | गांधीवादी विकास प्रारूप की अन्य विशेषताएं | Gandhian model in Hindi | Gandhian model on development in Hindi | Other features of Gandhian development model in Hindi

गांधीवादी प्रारूप

(Gandhian Model)

महात्मा गांधी एवं उनके अनुयायियों के अनुसार उस समाज की आंतरिक विशेषताओं का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। जिसका सामाजिक एवं आर्थिक विकास होना हो। कहने का तात्पर्यं यह है कि समाज में उपलब्ध साधनों का उपयोग हो ताकि उससे अधिक से अधिक लाभ सामान्य लोगों को प्राप्त हो सके।

गांधी का सामाजिक विकास दो मुख्य सिद्धांतों पर केन्द्रित है वे है सत्य और अहिंसा।

सत्य यदि साध्य है तो उसे प्राप्त करने का साधन अहिंसा होगा। महात्मा गांधी ने मत व्यक्त किया था कि अहिंसा न केवल व्यक्तिगत जीवन में उपयोगी है अपितु सामूहिक जीवन में इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

विकास के लिए शांतिपूर्ण माहौल आवश्यक है जिसके लिए अहिंसा और सत्य आवश्यक है। हिंसा को अहिंसा से नीचा दिखाना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। क्षमा और सजा की अपेक्षा वीरत्व है। सत्याग्रह गांधीवाद में प्रमुख स्थान रखता है।

गांधी रचनात्मक कार्य के प्रबल समर्थक थे। रचनात्मक कार्यक्रम के द्वारा ही राष्ट्र कल्याण संभव है। उनका मत था कि अहिंसात्मक उपायों से रचनात्मक कार्यक्रम पूरा करके हम लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ये कार्यक्रम हैं- साम्प्रदायिक एकता, अस्पृश्यता निवारण, मद्य निषेध, खादी ग्रामोउद्योग, प्रौढ़ शिक्षा, ग्राम स्वच्छता, नारी जागरण, प्राकृतिक चिकित्सा, आर्थिक समानता के लिए कार्य करना ।

सामाजिक विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति गांधी के सर्वोदय की अवधारणा में समाहित है। गांधी के सर्वोदय की अवधारणा पर रास्किन के पुस्तक ‘Unto this Last’ का प्रभाव पड़ा था। सर्वोदय दर्शन के आधार है। जीओ इसलिए कि दूसरे की मदद करो ताकि वे जीवित रहें। इसके पहले यूरोपीय देशों में दो दर्शन प्रभाव में रहे-

  1. योग्यतम का जीवन (Survival of the Fittest) को डार्विनवाद के नाम से भी जाना जाता है। विकास की इस अवधारणा में गोग्यता, शक्ति तथा अनुकूलन आधार है जो विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
  2. दूसरा दर्शन हक्सले तथा अन्य उपयोगितावादी विचारकों का है जिसमें कहा गया ‘जीओ और जीने दो’ (Live and Let Live
  3. तीसरा दर्शन गांधी का है ‘जीओ इसलिए कि दूसरों की मदद करो ताकि वे जीवित रहें।

(Live order to help others to Love)

गांधी जी की मान्यता थी कि आर्थिक विकास के लिए घरेलू तथा लघु उद्योग धंधों को विकसित किया जाये। घरेलू उद्योग धंधे उन कच्चे मालों पर केन्द्रित होना चाहिए जो उस स्थान विशेष पर उपलब्ध हो। ग्राम की सम्पूर्ण इकाई के रूप में कार्य करेगी। ग्रामी पंचायतों के माध्यम से सत्ता विकेन्द्रीकरण होगा। सत्य का महत्व बढ़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को राज्य एवं ग्राम की एक आवश्यक इकाई मानकर चलेगा। प्रत्येक राज्य अपनी सीमा में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को काम देगा। बेकारी दूर करना राज्य का उद्देश्य होगा। हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के आधार काम मिलेगा।

निष्कर्ष –

महात्मा गांधी के सामाजिक विकास की परिकल्पना उनके सर्वोदय की अवधारणा है। सर्वोदय प्रत्येक और सभी (Each and all) के विकास की बात स्वीकार करता है। ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुखभाग्यवेत।’

गांधीवादी विकास का प्रारूप भयमुक्त समाज की कल्पना पर आधारित है। सभी लोग परस्पर कर्तव्य भावना से प्रेरित होकर कार्य करेंगे। सभी लोग अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक  विकास के लिए पर्याप्त अवसर एवं सुविधा प्राप्त कर सकेंगे। समाज सत्य एवं अहिंसा पर आधारित होगा। सभी लोग चरित्रवान होंगे और सबका आचरण नैतिकता युक्त होगा। राज्य का शासन न्यूनतम होगा। सर्वोदय समाज में जातिवाद तथा पंथ भेद का कोई स्थान नहीं होगा। व्यक्ति और समूह दोनों के विकास के लिए पर्याप्त अवसर होगा। किसी का कोई अन्य शोषण नहीं कर सकेगा। अर्थव्यवस्था लाभ कमाने की भावना पर आधारित न होकर सेवा भावना पर आधारित होगी। अपरिग्रह और अस्तेय अर्थात संचय न करना और चोरी न करना, उस समाज की व्यवस्था की विशेषता होगी। सर्वोदय में सभी सुख-शांति और समृद्धि से सम्पन्न होंगे। कोई भी दुखी तथा अभावग्रस्त नहीं होगा। प्रत्येक निर्धन व्यक्ति को भी जीवन की वे सभी साधारण सुविधाएं प्राप्त होगी जो धनवानों को प्राप्त है। जाति, वर्ग अथवा सम्प्रदाय के आधार पर कोई ऊंचा नीचा नहीं होगा। ग्राम गणराज्य की स्थापना होगी। सभी पंथ ईश्वर की ओर ले जाते हैं। अहिंसा भावना की कमी के कारण साम्प्रदायिकता फैलती हैं। सभी धर्म पूर्णतः उदार एवं सहिष्णु बने ताकि साथ-साथ चल सकें। अन्त्योदय (Poorest of the Poor) अर्थात समाज में सबसे गरीब लोगों के कल्याण का कार्यक्रम गांधीवादी विकास का आधार है। गांधीवादी विकास के प्रारूप में ट्रस्टी शिप की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है। व्यक्ति अपने संपत्ति का संरक्षक है- वह उस सम्पत्ति को अपने हित में प्रयोग करेगा शेष दूसरों के हित में प्रयोग में लाया जायेगा।

गांधीवादी विकास प्रारूप की अन्य विशेषताएं हैं:

  1. नैतिक आधार (Ethical Foundation) जिसमें आसक्ति का त्याग सर्वोपरि है। आसक्ति का त्याग व्यक्ति को बंधनों से मुक्त करेगा। सत्य, अहिंसा, त्याग तथा आत्मनियंत्रण नैतिकता में वृद्धि करते हैं। तपस्या और सत्याग्रह नैतिकता के स्तम्भ हैं।
  2. राजनैतिक व्यवस्था (Political Order) – राज्य सामाजिक बुराइयों का परिणाम है। व्यक्ति के पास आत्मा है लेकिन राज्य आत्मा विहीन है। प्रशासन व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करता है। सरकार एक कृत्रिम एवं बेकार की संस्था है जिसका कोई लाभकारी उद्देश्य नहीं है। प्रजातंत्र की सफलता के लिए नैतिक एवं आध्यात्मिक गुण सहायक होंगे। प्रत्येक गांव एक स्वतंत्रपूर्ण गणराज्य होगा। गांवों का प्रशासन ग्राम पंचायतें करेंगी। प्रतयेक गांव के पांच बुजुर्ग एकमतता (Consensus) के आधार पर चुने जायेंगे तथा उन्हें प्रशासन का दायित्व दिया जायेगा। शासन और शासित में भेद नहीं होगा। लोक नीति लोकशक्ति पर आधारित होगी।
  3. आर्थिक व्यवस्था (Economic Order) ग्राम की सभी भूमि पर सभी लोगों का अधिकार माना जायेगा। निजी सम्पत्ति की अवधारणा समाप्त होगी। सभी को सीमित आवश्यकता की अवधारणा को अपनाना होगा। उत्पादन करते समय दो बातों पर ध्यान रखना होगा।

(1) प्रकृति का शोषण व्यक्ति न करे और

(2) एक मनुष्य दूसरे का शोषण न करे।

ट्रस्टीशिप की अवधारणा विकसित होगी सामूहिक खेती और सामूहिक निवास की भावना सहयोगात्मक अंतःक्रिया को बढ़ावा देगी।

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